आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया: धारा 13ख

आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया: धारा 13ख

अंतिम अद्यतन: 18 अक्टूबर 2026 (Last updated: 18 October 2026)

संक्षिप्त उत्तर: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13ख के अंतर्गत पति और पत्नी मिलकर परिवार न्यायालय या जिला न्यायालय में संयुक्त याचिका (प्रथम प्रस्ताव) दाखिल करते हैं, जिसमें वे बताते हैं कि वे एक वर्ष या उससे अधिक से अलग रह रहे हैं, साथ नहीं रह सकते और विवाह समाप्त करने पर सहमत हैं। याचिका दाखिल होने के छह माह बाद और अठारह माह के भीतर दोनों पक्ष द्वितीय प्रस्ताव करते हैं, जिसके बाद न्यायालय तलाक की डिक्री पारित करता है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार छह माह की प्रतीक्षा अनिवार्य नहीं है; उचित मामलों में न्यायालय इसे समाप्त कर सकता है।

किन लोगों पर यह प्रक्रिया लागू होती है

धारा 13ख उन विवाहों पर लागू होती है जो हिंदू विवाह अधिनियम से शासित हैं, अर्थात् हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख। विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अंतर्गत हुए विवाहों के लिए धारा 28 में लगभग यही व्यवस्था है: एक वर्ष का पृथक निवास, संयुक्त याचिका, और छह से अठारह माह के बीच द्वितीय प्रस्ताव। अन्य समुदायों के लिए उनके अपने कानून लागू होते हैं।

तीन अनिवार्य शर्तें

  1. एक वर्ष का पृथक निवास: याचिका दाखिल करने की तिथि तक पति पत्नी कम से कम एक वर्ष से पति पत्नी की तरह साथ न रह रहे हों।
  2. साथ रहने में असमर्थता: दोनों यह कहें कि वे साथ नहीं रह पाए हैं।
  3. स्वतंत्र आपसी सहमति: धारा 23(1)(खख) के अनुसार न्यायालय को संतुष्ट होना होता है कि सहमति बल, कपट या असम्यक् असर से प्राप्त नहीं की गई है।

इसके अतिरिक्त धारा 14(1) के अनुसार विवाह की तिथि से एक वर्ष पूरा होने से पहले कोई तलाक याचिका ग्रहण नहीं की जाती, जब तक कि न्यायालय असाधारण कष्ट के आधार पर अनुमति न दे।

समय सारणी एक नज़र में

चरणक्या होता हैसमय का नियम
प्रथम प्रस्तावसंयुक्त याचिका दाखिल, दोनों पक्षों के बयान दर्जपहला दिन
प्रतीक्षा अवधि से छूट का आवेदन (वैकल्पिक)छह माह की अवधि समाप्त करने का अनुरोधप्रथम प्रस्ताव के एक सप्ताह बाद दाखिल किया जा सकता है
द्वितीय प्रस्तावदोनों पक्ष पुनः सहमति की पुष्टि करते हैंयाचिका प्रस्तुत होने के छह माह से पहले नहीं और अठारह माह के बाद नहीं: धारा 13ख(2)
डिक्रीविवाह डिक्री की तिथि से विघटितन्यायालय के संतुष्ट होने पर

याचिका कहाँ दाखिल करें

धारा 19 के अनुसार याचिका उस न्यायालय में दी जा सकती है जिसकी स्थानीय सीमा में विवाह संपन्न हुआ था, या जहाँ प्रत्यर्थी याचिका के समय निवास करता है, या जहाँ पति पत्नी अंतिम बार साथ रहे थे, या याचिकाकर्ता पत्नी हो तो जहाँ वह याचिका की तिथि पर रह रही है। जिन जिलों में परिवार न्यायालय स्थापित है, वहाँ याचिका परिवार न्यायालय में ही जाती है। अपने जनपद में सही न्यायालय की पुष्टि स्थानीय न्यायालय परिसर से कर लें।

चरणबद्ध प्रक्रिया

1. समझौते की शर्तें तय करें

याचिका से पहले लिखित रूप में तय करें: स्थायी भरण पोषण (एकमुश्त या किश्तों में), स्त्रीधन और उपहारों की वापसी, बच्चों की अभिरक्षा और मिलने का अधिकार, बच्चों का खर्च, और आपस में लंबित मुकदमों की वापसी। अस्पष्ट शर्तें बाद में नए विवाद का कारण बनती हैं।

2. प्रथम प्रस्ताव

दोनों पक्ष संयुक्त याचिका और अपने अपने शपथपत्र दाखिल करते हैं और न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर बयान देते हैं। सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 32क के अंतर्गत पारिवारिक मामलों में समझौते के प्रयास पर बल दिया गया है, इसलिए कई न्यायालय इस चरण पर मध्यस्थता या परामर्श के लिए भेजते हैं।

3. प्रतीक्षा अवधि या उससे छूट

सामान्यतः छह माह प्रतीक्षा करनी होती है। अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर, (2017) 8 SCC 746 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 13ख(2) की छह माह की अवधि निर्देशात्मक है, आज्ञापक नहीं। न्यायालय छूट देने से पहले देखता है कि:

  • प्रथम प्रस्ताव से पहले ही एक वर्ष के पृथक निवास के साथ छह माह की अवधि भी बीत चुकी है;
  • मध्यस्थता और सुलह के सभी प्रयास विफल हो चुके हैं और साथ रहने की कोई संभावना नहीं है;
  • भरण पोषण, अभिरक्षा और अन्य लंबित विषयों पर वास्तविक समझौता हो चुका है;
  • प्रतीक्षा केवल पक्षकारों की पीड़ा बढ़ाएगी।

उसी निर्णय में कहा गया कि छूट का आवेदन प्रथम प्रस्ताव के एक सप्ताह बाद कारण बताते हुए दिया जा सकता है, और उचित कारण होने पर न्यायालय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग कर सकता है तथा माता पिता या भाई बहन जैसे निकट संबंधियों के माध्यम से प्रतिनिधित्व की अनुमति दे सकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जनवरी 2025 में विदेश में रह रहे पति को आपसी सहमति के मामले में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से उपस्थित होने देने का निर्देश परिवार न्यायालय को दिया था।

4. द्वितीय प्रस्ताव और डिक्री

द्वितीय प्रस्ताव में दोनों पक्ष बताते हैं कि उनकी सहमति अब भी बनी हुई है। न्यायालय संतुष्ट होने पर कि विवाह संपन्न हुआ था और याचिका के कथन सत्य हैं, डिक्री पारित करता है, जिससे विवाह उसी तिथि से विघटित हो जाता है। डिक्री की प्रमाणित प्रति अवश्य लें, क्योंकि नाम परिवर्तन, पासपोर्ट और पुनर्विवाह में इसकी आवश्यकता पड़ती है।

आवश्यक दस्तावेज़

दस्तावेज़उद्देश्य
विवाह प्रमाणपत्र, या निमंत्रण पत्र और विवाह के फ़ोटोविवाह संपन्न होने का प्रमाण
दोनों पक्षों के पहचान और पते के प्रमाणपहचान और क्षेत्राधिकार
पासपोर्ट आकार के फ़ोटोयाचिका और शपथपत्रों के साथ
अलग निवास का प्रमाण (किरायानामा, बिजली बिल आदि)एक वर्ष के पृथक निवास की पुष्टि
लिखित समझौताभरण पोषण, स्त्रीधन, अभिरक्षा, मुकदमों की वापसी
बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र (यदि हों)अभिरक्षा की व्यवस्था
दोनों के शपथपत्रतथ्यों और स्वतंत्र सहमति का सत्यापन

शपथपत्र तैयार करने और नोटरी से सत्यापन की विधि के लिए हमारी मार्गदर्शिका शपथ पत्र का प्रारूप और नोटरी प्रक्रिया देखें।

छूट आवेदन की प्रार्थना का निःशुल्क नमूना

न्यायालय प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, [जनपद]
याचिका संख्या ____ वर्ष [ ]
[पति का नाम] एवं [पत्नी का नाम] ….. याचीगण

विषय: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13ख(2) में वर्णित छह माह की अवधि से छूट हेतु संयुक्त प्रार्थना पत्र

1. याचीगण ने दिनांक [ ] को धारा 13ख(1) के अंतर्गत संयुक्त याचिका प्रस्तुत की थी, जिसमें दिनांक [ ] को दोनों के बयान दर्ज हुए।

2. याचीगण दिनांक [ ] से, अर्थात् याचिका प्रस्तुत करने से [ ] माह पूर्व से, पृथक रह रहे हैं। मध्यस्थता केंद्र में दिनांक [ ] को हुए प्रयास विफल रहे हैं और साथ रहने की कोई संभावना नहीं है।

3. याचीगण के मध्य भरण पोषण, स्त्रीधन और [अभिरक्षा] के सभी विषयों पर पूर्ण समझौता हो चुका है, जिसकी शर्तें याचिका में अंकित हैं।

4. प्रतीक्षा अवधि जारी रहने से याचीगण की मानसिक पीड़ा ही बढ़ेगी।

प्रार्थना: अतः निवेदन है कि अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर, (2017) 8 SCC 746 में प्रतिपादित सिद्धांतों के आलोक में छह माह की प्रतीक्षा अवधि से छूट प्रदान कर द्वितीय प्रस्ताव पर शीघ्र सुनवाई की कृपा करें।

स्थान: [ ] दिनांक: [ ]
हस्ताक्षर याची संख्या 1: [ ]
हस्ताक्षर याची संख्या 2: [ ]

पूरा, संपादन योग्य सेट चाहिए? Lexfolio की Mutual Consent Divorce Kit में धारा 13ख के मामले के प्रत्येक चरण के संपादन योग्य प्रारूप, जैसे संयुक्त याचिका, शपथपत्र, छूट आवेदन और द्वितीय प्रस्ताव, तथा समझौते की शर्तों की सरल जाँच सूची दी गई है।

क्या एक वर्ष का पृथक निवास भी माफ़ हो सकता है?

दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने शिक्षा कुमारी बनाम संतोष कुमार (17 दिसंबर 2025) में कहा कि धारा 13ख(1) की एक वर्ष की अवधि धारा 14(1) के परंतुक को लागू करके माफ़ की जा सकती है, परंतु केवल याचिकाकर्ता के असाधारण कष्ट या प्रत्यर्थी की असाधारण दुराचारिता की स्थिति में। यह निर्णय दिल्ली में बाध्यकारी है; अन्य राज्यों के न्यायालय अपना दृष्टिकोण अपना सकते हैं।

इसके अलावा संविधान पीठ ने शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन (1 मई 2023) में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 142 के अंतर्गत आपसी सहमति से विवाह विघटित कर सकता है और प्रतीक्षा अवधि समाप्त कर सकता है। यह शक्ति केवल सर्वोच्च न्यायालय की है।

सहमति वापस लेना और सावधानियाँ

सहमति डिक्री तक बनी रहनी चाहिए। सुरेष्टा देवी बनाम ओम प्रकाश (1991) और हितेश भटनागर बनाम दीपा भटनागर, (2011) 5 SCC 234 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कोई भी पक्ष डिक्री से पहले कभी भी सहमति वापस ले सकता है, और संयुक्त द्वितीय प्रस्ताव के बिना धारा 13ख में डिक्री नहीं दी जा सकती। इसलिए भरण पोषण की राशि चरणों में बाँटें, जैसे कुछ भाग प्रथम प्रस्ताव पर और शेष द्वितीय प्रस्ताव पर, और लिखें कि सहमति वापस लेने पर दी गई राशि का क्या होगा।

डिक्री के बाद अपील की समस्या प्रायः नहीं रहती: सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96(3) और परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 19(2) के अनुसार पक्षकारों की सहमति से पारित डिक्री के विरुद्ध अपील नहीं होती। धारा 15 के अनुसार अपील का अधिकार न होने पर पुनर्विवाह विधिसम्मत है।

खर्च किन बातों पर निर्भर करता है

  • न्यायालय शुल्क: प्रत्येक राज्य के न्यायालय शुल्क कानून से तय होता है।
  • स्टांप पेपर और नोटरी: शपथपत्र और समझौते के लिए, दरें राज्य अनुसार।
  • प्रारूपण और पैरवी का पेशेवर शुल्क: शहर, सुनवाइयों की संख्या और समझौते की जटिलता पर।
  • भरण पोषण की राशि: अधिकांश मामलों में सबसे बड़ा खर्च।
  • यात्रा और समय: कम से कम दो बार व्यक्तिगत उपस्थिति, जब तक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की अनुमति न मिले।

अंग्रेज़ी में विस्तृत जानकारी और संयुक्त याचिका के मुख्य अनुच्छेदों के नमूने के लिए देखें: Mutual consent divorce procedure in India।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आपसी सहमति से तलाक में कितना समय लगता है?

सामान्यतः प्रथम प्रस्ताव से छह माह से कुछ अधिक, क्योंकि द्वितीय प्रस्ताव छह माह से पहले नहीं हो सकता। प्रतीक्षा अवधि से छूट मिलने पर कुछ सप्ताह में भी डिक्री हो सकती है।

क्या विवाह के एक वर्ष के भीतर आपसी सहमति से तलाक हो सकता है?

धारा 14(1) के अनुसार सामान्यतः नहीं। असाधारण कष्ट या असाधारण दुराचारिता की स्थिति में न्यायालय की अनुमति से याचिका पहले दी जा सकती है।

क्या दोनों पक्षों का स्वयं उपस्थित होना ज़रूरी है?

न्यायालय सामान्यतः दोनों से सीधे सहमति की पुष्टि करना चाहता है। उचित कारण होने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या निकट संबंधी के माध्यम से प्रतिनिधित्व की अनुमति दी जा सकती है।

प्रथम प्रस्ताव के बाद एक पक्ष मुकर जाए तो?

डिक्री से पहले सहमति वापस ली जा सकती है। तब दूसरे पक्ष को धारा 13 के किसी आधार पर विवादित तलाक याचिका दाखिल करनी पड़ सकती है।

अठारह माह में द्वितीय प्रस्ताव न हो तो?

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार अठारह माह की सीमा शीघ्र निपटारे के लिए है, और इस अवधि में संयुक्त द्वितीय प्रस्ताव न होने पर न्यायालय डिक्री देने को बाध्य नहीं है। इसलिए याचिका दाखिल करते ही छह और अठारह माह की तिथियाँ नोट कर लें।

*यह लेख सामान्य जानकारी है, विधिक परामर्श नहीं (general information, not legal advice).*

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