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  • जमानत प्रार्थना पत्र का प्रारूप: बीएनएसएस धारा 480

    जमानत प्रार्थना पत्र का प्रारूप: बीएनएसएस धारा 480

    अंतिम अद्यतन: 18 अक्टूबर 2026 (Last updated: 18 October 2026)

    संक्षिप्त उत्तर: 1 जुलाई 2024 से जमानत के प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) के अध्याय 35 में हैं। अजमानतीय अपराध में गिरफ़्तार व्यक्ति पहले मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 480 के अंतर्गत जमानत प्रार्थना पत्र देता है; वहाँ से अस्वीकार होने पर या गंभीर अपराधों में सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 483 के अंतर्गत आवेदन किया जाता है। प्रार्थना पत्र में न्यायालय का नाम, मुकदमा अपराध संख्या, धाराएँ, थाना, गिरफ़्तारी की तिथि, जमानत के आधार, पूर्व आवेदनों का विवरण और प्रार्थना लिखी जाती है, तथा साथ में शपथपत्र लगाया जाता है। नीचे एक संक्षिप्त निःशुल्क प्रारूप दिया गया है।

    जमानत से जुड़ी नई और पुरानी धाराएँ

    विषयदंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (पुरानी)बीएनएसएस, 2023 (नई)
    जमानतीय अपराध में जमानतधारा 436धारा 478
    विचाराधीन बंदी की अधिकतम निरुद्धिधारा 436कधारा 479
    अजमानतीय अपराध में जमानत (मजिस्ट्रेट)धारा 437धारा 480
    अपील न्यायालय के समक्ष उपस्थिति हेतु बंधपत्रधारा 437कधारा 481
    अग्रिम जमानतधारा 438धारा 482
    उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय की विशेष शक्तियाँधारा 439धारा 483
    बंधपत्र की राशि और उसमें कमीधारा 440धारा 484

    बीएनएसएस ने पहली बार “जमानत” की परिभाषा भी दी है। धारा 2(1)(ख) के अनुसार जमानत का अर्थ है किसी अपराध के अभियुक्त या संदिग्ध व्यक्ति को अधिकारी या न्यायालय द्वारा लगाई गई शर्तों पर, बंधपत्र या जमानत बंधपत्र निष्पादित करने पर, विधि की अभिरक्षा से मुक्त करना। धारा 2(1)(घ) के अनुसार “जमानत बंधपत्र” प्रतिभू (ज़मानतदार) सहित मुक्ति का वचन है, जबकि धारा 2(1)(ङ) का “बंधपत्र” बिना प्रतिभू का व्यक्तिगत वचन है।

    किस न्यायालय में आवेदन करें

    • जमानतीय अपराध: धारा 478 के अनुसार जमानत अधिकार के रूप में मिलती है, थाने पर भी। निर्धन व्यक्ति, जो प्रतिभू न दे सके, उसे बंधपत्र पर छोड़ा जाना चाहिए; एक सप्ताह में जमानत बंधपत्र न दे पाने पर उसे निर्धन माना जा सकता है।
    • अजमानतीय अपराध, पहला चरण: संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 480 के अंतर्गत।
    • मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध, या मजिस्ट्रेट से अस्वीकृति: सत्र न्यायालय के समक्ष धारा 483 के अंतर्गत।
    • सत्र न्यायालय से अस्वीकृति: उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 483 के अंतर्गत।
    • गिरफ़्तारी की आशंका हो: अग्रिम जमानत, धारा 482। विस्तार के लिए देखें हमारी मार्गदर्शिका Anticipatory bail under section 482 BNSS।

    धारा 480: मजिस्ट्रेट से जमानत के मुख्य नियम

    • यदि यह विश्वास करने के उचित आधार हों कि अपराध मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय है, तो मजिस्ट्रेट सामान्यतः जमानत नहीं देता, परंतु बालक, महिला या रोगी अथवा अशक्त व्यक्ति को जमानत दी जा सकती है।
    • मृत्यु, आजीवन कारावास या सात वर्ष या अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध में जमानत से पहले लोक अभियोजक को सुनवाई का अवसर देना होता है।
    • सात वर्ष या अधिक के कारावास वाले अपराधों में धारा 480(3) के अंतर्गत शर्तें लगाई जाती हैं: बंधपत्र के अनुसार उपस्थित होना, वैसा ही अपराध न करना, और गवाहों को धमकी या प्रलोभन न देना तथा साक्ष्य से छेड़छाड़ न करना।
    • जमानत देने के कारण लिखित में दर्ज किए जाते हैं (धारा 480(4))।
    • मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय अजमानतीय मामले में यदि साक्ष्य के लिए नियत पहली तिथि से साठ दिन में विचारण पूरा न हो और अभियुक्त पूरी अवधि अभिरक्षा में रहा हो, तो उसे जमानत पर छोड़ा जाता है, जब तक मजिस्ट्रेट लिखित कारणों से अन्यथा निर्देश न दे (धारा 480(6))।

    धारा 483: सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय

    ये न्यायालय अभिरक्षा में बंद किसी भी अभियुक्त को जमानत दे सकते हैं और मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई शर्त को हटा या बदल सकते हैं। केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध में जमानत से पहले लोक अभियोजक को नोटिस देना होता है, जब तक न्यायालय लिखित कारणों से इसे अव्यवहार्य न माने। भारतीय न्याय संहिता की धारा 65 या धारा 70(2) के अपराधों में आवेदन प्राप्त होने के पंद्रह दिन के भीतर लोक अभियोजक को नोटिस देना और सुनवाई के समय सूचनादाता या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की उपस्थिति आवश्यक है।

    जमानत के दो वैधानिक रास्ते जिन्हें न भूलें

    प्रावधाननियम
    धारा 187(3): आरोप पत्र में विलंबमृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष या अधिक के कारावास वाले अपराध में 90 दिन, अन्य अपराधों में 60 दिन तक आरोप पत्र न आने पर, अभियुक्त जमानत देने को तैयार हो तो उसे जमानत पर छोड़ा जाता है
    धारा 479: विचाराधीन बंदीमृत्यु या आजीवन कारावास वाले अपराधों को छोड़कर, अधिकतम दंड की आधी अवधि तक निरुद्ध रहने पर जमानत; पहली बार के अपराधी को एक तिहाई अवधि के बाद बंधपत्र पर मुक्ति। एक से अधिक मामलों में लंबित अभियुक्त पर यह लाभ लागू नहीं

    सर्वोच्च न्यायालय ने सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई, (2022) 10 SCC 51 में अपराधों की श्रेणियाँ बनाकर जमानत संबंधी विस्तृत दिशानिर्देश दिए थे, जिनका उल्लेख जमानत प्रार्थना पत्रों में प्रायः किया जाता है।

    आवश्यक दस्तावेज़

    • प्राथमिकी (एफ़आईआर) की प्रति और रिमांड आदेश की प्रति
    • अभियुक्त की ओर से शपथपत्र (जेल में हो तो प्रायः किसी निकट संबंधी द्वारा पैरवी हेतु शपथपत्र)
    • पूर्व जमानत आवेदनों और उन पर पारित आदेशों की प्रतियाँ
    • चिकित्सा प्रपत्र, आयु प्रमाण या अन्य विशेष आधारों के दस्तावेज़
    • जमानत मिलने पर: प्रतिभुओं के पहचान पत्र, पते के प्रमाण और संपत्ति या आय के प्रमाण, जैसा न्यायालय माँगे

    जमानत प्रार्थना पत्र का निःशुल्क प्रारूप (धारा 480)

    न्यायालय श्रीमान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट / न्यायिक मजिस्ट्रेट, [जनपद]

    राज्य बनाम [अभियुक्त का नाम]
    मुकदमा अपराध संख्या [ ] वर्ष [ ]
    धारा [ ] भारतीय न्याय संहिता, 2023
    थाना [ ], जनपद [ ]

    प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 480 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 बाबत जमानत

    महोदय,
    प्रार्थी/अभियुक्त [नाम], पुत्र [पिता का नाम], निवासी [पता], निम्नलिखित निवेदन करता है:

    1. प्रार्थी को उपरोक्त मुकदमे में दिनांक [ ] को गिरफ़्तार किया गया और वह तब से जिला कारागार [ ] में निरुद्ध है।

    2. प्रार्थी निर्दोष है और उसे [संक्षिप्त कारण, जैसे आपसी रंजिश या संपत्ति विवाद] के कारण झूठा फँसाया गया है। प्राथमिकी में प्रार्थी की भूमिका सामान्य और अस्पष्ट है।

    3. प्रार्थी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। वह जनपद का स्थायी निवासी है और उसके भागने या साक्ष्य से छेड़छाड़ करने की कोई संभावना नहीं है।

    4. मामले की विवेचना [पूर्ण हो चुकी है / जारी है] और प्रार्थी से कोई बरामदगी शेष नहीं है।

    5. इस मुकदमे में प्रार्थी की ओर से कोई अन्य जमानत प्रार्थना पत्र किसी न्यायालय में लंबित या निर्णीत नहीं है। [यदि हो तो विवरण दें।]

    6. प्रार्थी न्यायालय द्वारा लगाई गई प्रत्येक शर्त का पालन करने और प्रत्येक तिथि पर उपस्थित रहने का वचन देता है।

    प्रार्थना: अतः श्रीमान जी से निवेदन है कि प्रार्थी को उपरोक्त मुकदमे में जमानत पर रिहा करने का आदेश पारित करने की कृपा करें।

    स्थान: [ ] दिनांक: [ ]
    प्रार्थी: [नाम]
    द्वारा पैरोकार: [नाम और संबंध]

    सत्र न्यायालय में धारा 483 के अंतर्गत आवेदन करते समय मजिस्ट्रेट द्वारा अस्वीकृति का आदेश संलग्न करें और उसका उल्लेख करें। जिलों में शीर्षक और प्रारूप की स्थानीय परिपाटी अलग हो सकती है।

    पूरा, संपादन योग्य सेट चाहिए? Lexfolio के Bail Application Formats (BNSS) में बीएनएसएस की नई धाराओं के अनुसार नियमित जमानत, अग्रिम जमानत और शपथपत्र के हिंदी और अंग्रेज़ी में संपादन योग्य प्रारूप दिए गए हैं।

    प्रार्थना पत्र लिखते समय सामान्य गलतियाँ

    • पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 या 439 लिख देना, जबकि 1 जुलाई 2024 के बाद के मामलों में बीएनएसएस की धारा लागू होती है।
    • भारतीय दंड संहिता की धाराएँ लिखना, जबकि नए मामलों में भारतीय न्याय संहिता लागू है। धाराएँ मिलाने के लिए देखें IPC to BNS section converter।
    • पूर्व जमानत आवेदनों की जानकारी छिपाना।
    • केवल “प्रार्थी निर्दोष है” लिखना, ठोस आधार न देना।
    • धारा 187(3) या धारा 479 का लाभ उपलब्ध होने पर भी उसका उल्लेख न करना।

    शपथपत्र के प्रारूप और सत्यापन के लिए हमारी मार्गदर्शिका शपथ पत्र का प्रारूप और नोटरी प्रक्रिया उपयोगी है।

    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    जमानत की धारा अब कौन सी है?

    मजिस्ट्रेट से अजमानतीय अपराध में जमानत के लिए धारा 480, सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय के लिए धारा 483, और अग्रिम जमानत के लिए धारा 482 बीएनएसएस।

    क्या जमानत प्रार्थना पत्र हिंदी में दिया जा सकता है?

    उत्तर प्रदेश सहित हिंदी भाषी राज्यों के अधीनस्थ न्यायालयों में हिंदी में प्रार्थना पत्र सामान्य रूप से स्वीकार किए जाते हैं।

    महिला अभियुक्त को जमानत में कोई छूट है?

    धारा 480 के परंतुक के अनुसार मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध में भी मजिस्ट्रेट महिला, बालक या रोगी अथवा अशक्त व्यक्ति को जमानत दे सकता है।

    आरोप पत्र समय पर न आए तो क्या करें?

    धारा 187(3) में बताई गई 60 या 90 दिन की अवधि बीतते ही जमानत का प्रार्थना पत्र दें और जमानत देने की तत्परता दिखाएँ।

    जमानत अस्वीकार हो जाए तो?

    मजिस्ट्रेट से अस्वीकृति पर सत्र न्यायालय में और सत्र न्यायालय से अस्वीकृति पर उच्च न्यायालय में धारा 483 के अंतर्गत आवेदन किया जा सकता है।

    *यह लेख सामान्य जानकारी है, विधिक परामर्श नहीं (general information, not legal advice).*