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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं। मेनका गांधी मामले (1978) के बाद यह प्रक्रिया उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिए, और “जीवन” का अर्थ अब गरिमापूर्ण जीवन है, जिसमें निजता, आजीविका, शीघ्र विचारण और स्वच्छ पर्यावरण जैसे अनेक अधिकार शामिल हैं।
अनुच्छेद 21 का पाठ और इसका लाभ किसे मिलता है
अनुच्छेद 21 संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों के अंतर्गत आता है। मूल अंग्रेज़ी पाठ है: “No person shall be deprived of his life or personal liberty except according to procedure established by law.” यह एक ही वाक्य है, पर इसमें दो अलग संरक्षण हैं: जीवन का संरक्षण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण।
यहाँ “व्यक्ति” (Person) शब्द प्रयुक्त है, “नागरिक” नहीं। इसलिए यह अधिकार भारत में मौजूद हर व्यक्ति को प्राप्त है, विदेशी नागरिकों को भी। अनुच्छेद 19 जैसे अधिकार केवल नागरिकों के लिए हैं, यही दोनों में मुख्य अंतर है।
गोपालन से मेनका तक: अर्थ कैसे बदला
ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950)
अनुच्छेद 21 के पहले बड़े मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का संकीर्ण अर्थ लिया। वैध रूप से बनाए गए किसी भी कानून में दी गई प्रक्रिया पर्याप्त मानी गई। न्यायालय ने हर मौलिक अधिकार को अलग खाना माना, इसलिए निवारक निरोध (Preventive Detention) कानून को अनुच्छेद 19 की कसौटी पर परखना आवश्यक नहीं समझा गया।
ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976)
आपातकाल के दौरान 4:1 के बहुमत ने कहा कि जब राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 359 के तहत अनुच्छेद 21 के प्रवर्तन को निलंबित कर दिया हो, तब कोई भी व्यक्ति अवैध निरोध के विरुद्ध भी न्यायालय नहीं जा सकता। न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने असहमति (Dissent) जताई और कहा कि जीवन का अधिकार केवल संविधान के शब्दों पर निर्भर नहीं है। बाद में पुट्टस्वामी (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने ए.डी.एम. जबलपुर के बहुमत मत को गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण कहा। संसद ने भी 44वें संशोधन (1978) द्वारा अनुच्छेद 359 में बदलाव किया, जिससे आपातकाल में भी अनुच्छेद 20 और 21 का प्रवर्तन निलंबित नहीं किया जा सकता।
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978)
सात न्यायाधीशों की पीठ ने अनुच्छेद 21 की दिशा ही बदल दी। न्यायालय ने कहा कि प्रक्रिया “उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त” (Fair, Just and Reasonable) होनी चाहिए, मनमानी या दमनकारी नहीं। साथ ही अनुच्छेद 14, 19 और 21 को अलग-अलग खाने नहीं माना गया। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले कानून को अनुच्छेद 14 और 19 की कसौटी भी पार करनी होगी। व्यवहार में इससे अनुच्छेद 21 में सम्यक प्रक्रिया (Due Process) का तत्व आ गया।
अनुच्छेद 21 का विस्तार: प्रमुख अधिकार
1978 के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने “जीवन” और “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” शब्दों में अनेक अधिकार पढ़े। प्रमुख इस प्रकार हैं:
| मान्य अधिकार | प्रमुख निर्णय | वर्ष |
|---|---|---|
| विदेश यात्रा का अधिकार | मेनका गांधी बनाम भारत संघ | 1978 |
| शीघ्र विचारण और विचाराधीन बंदियों को निःशुल्क विधिक सहायता | हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य | 1979 |
| कैदियों के अधिकार | सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन | 1979 |
| मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार | फ्रांसिस कोराली मुलिन बनाम प्रशासक, दिल्ली | 1981 |
| आजीविका का अधिकार | ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन | 1985 |
| शिक्षा का अधिकार (जिससे 2002 में अनुच्छेद 21A आया) | उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य | 1993 |
| जबरन नार्को-विश्लेषण, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग से संरक्षण | सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य | 2010 |
| निजता मौलिक अधिकार | न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ | 2017 |
| गरिमा के साथ मृत्यु और अग्रिम चिकित्सा निर्देश | कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ | 2018 |
| यौन स्वायत्तता, सहमति से समलैंगिक संबंध अपराध नहीं | नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ | 2018 |
जीवन का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं
फ्रांसिस कोराली मुलिन में न्यायालय ने समझाया कि जीवन में गरिमापूर्ण अस्तित्व की न्यूनतम आवश्यकताएँ शामिल हैं: पर्याप्त पोषण, वस्त्र, आश्रय, और पढ़ने, लिखने तथा स्वयं को अभिव्यक्त करने की सुविधा। गरिमा की यही व्याख्या आगे के अधिकांश विस्तार की नींव बनी।
आजीविका
ओल्गा टेलिस में बॉम्बे के फुटपाथ और झुग्गी निवासियों ने बेदखली को चुनौती दी। न्यायालय ने माना कि जीवन के अधिकार में आजीविका का अधिकार शामिल है, क्योंकि जीविका के साधनों के बिना कोई जी नहीं सकता। बेदखली पूरी तरह रद्द नहीं हुई, पर न्यायालय ने उचित प्रक्रिया पर ज़ोर दिया।
निजता
24 अगस्त 2017 को नौ न्यायाधीशों की पीठ ने पुट्टस्वामी में सर्वसम्मति से कहा कि निजता (Privacy) अनुच्छेद 21 और पूरे भाग III के अंतर्गत संरक्षित मौलिक अधिकार है। एम.पी. शर्मा (1954) और खड़क सिंह (1962) को उस सीमा तक उलट दिया गया जहाँ तक वे इसके विपरीत थे।
गरिमापूर्ण मृत्यु
9 मार्च 2018 को पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने कॉमन कॉज़ में गरिमा के साथ मरने के अधिकार को अनुच्छेद 21 का भाग माना और अग्रिम चिकित्सा निर्देश (Living Will) को कानूनी मान्यता दी। जनवरी 2023 में न्यायालय ने 2018 की प्रक्रिया को सरल किया।
अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 21A
अनुच्छेद 21A संविधान (86वाँ संशोधन) अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया। यह 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है, उस रीति से जैसा राज्य कानून द्वारा निर्धारित करे। यह सीधे उन्नीकृष्णन मामले की व्याख्या से निकला।
अनुच्छेद 21 की सीमाएँ
अनुच्छेद 21 निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। राज्य मृत्युदंड या कारावास द्वारा जीवन या स्वतंत्रता से वंचित कर सकता है, बशर्ते वह विधि द्वारा स्थापित, उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त प्रक्रिया का पालन करे। निजता जैसे अधिकारों पर भी प्रतिबंध लग सकता है, यदि उसका विधिक आधार हो, उद्देश्य वैध हो और प्रतिबंध आनुपातिक (Proportionate) हो, जैसा पुट्टस्वामी में समझाया गया।
परीक्षा की दृष्टि से
- पाठ आधारित प्रश्न: CLAT और AIBE में पूछा जाता है कि क्या अनुच्छेद 21 विदेशियों को उपलब्ध है। हाँ, क्योंकि इसमें “व्यक्ति” शब्द है।
- मामला-वर्ष मिलान: ओल्गा टेलिस से आजीविका, पुट्टस्वामी से निजता, कॉमन कॉज़ से लिविंग विल, हुसैनारा खातून से शीघ्र विचारण।
- आपातकाल: 44वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 359 के तहत अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित नहीं हो सकते। न्यायिक सेवा प्रारंभिक और UGC NET का प्रिय प्रश्न।
- सैद्धांतिक बदलाव: न्यायिक सेवा मुख्य परीक्षा में गोपालन की संकीर्ण व्याख्या से मेनका गांधी की “उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त” कसौटी तक की यात्रा पर प्रश्न आते हैं।
- अनुच्छेद 21A: 86वाँ संशोधन, 2002, और आयु वर्ग 6 से 14 वर्ष याद रखें।
त्वरित प्रश्नोत्तरी
Q1. किस मामले में कहा गया कि आजीविका का अधिकार अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार का भाग है?
- ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य
- खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन
- कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ
उत्तर देखें
उत्तर: C. ओल्गा टेलिस (1985) में न्यायालय ने कहा कि जीविका के साधनों के बिना जीवन संभव नहीं, इसलिए आजीविका जीवन के अधिकार का अंग है।
Q2. निजता को मौलिक अधिकार घोषित करने वाला नौ न्यायाधीशों का निर्णय कौन सा है?
- न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)
- आर. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य (1994)
- PUCL बनाम भारत संघ (1996)
- सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010)
उत्तर देखें
उत्तर: A. 24 अगस्त 2017 को नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से निजता को अनुच्छेद 21 और भाग III के अंतर्गत मौलिक अधिकार माना।
Q3. 44वें संशोधन के बाद राष्ट्रीय आपातकाल में किन अनुच्छेदों का प्रवर्तन निलंबित नहीं किया जा सकता?
- अनुच्छेद 14 और 21
- अनुच्छेद 19 और 21
- अनुच्छेद 21 और 32
- अनुच्छेद 20 और 21
उत्तर देखें
उत्तर: D. 44वें संशोधन (1978) ने अनुच्छेद 359 में बदलाव कर अनुच्छेद 20 और 21 के प्रवर्तन हेतु न्यायालय जाने के अधिकार को निलंबन से बाहर कर दिया।
Q4. अनुच्छेद 21A किस संशोधन द्वारा जोड़ा गया?
- 42वाँ संशोधन, 1976
- 86वाँ संशोधन, 2002
- 44वाँ संशोधन, 1978
- 93वाँ संशोधन, 2005
उत्तर देखें
उत्तर: B. संविधान (86वाँ संशोधन) अधिनियम, 2002 ने 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए अनुच्छेद 21A जोड़ा।
Q5. ए.डी.एम. जबलपुर (1976) में असहमति किसने जताई थी?
- न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़
- न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती
- न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना
- मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे
उत्तर देखें
उत्तर: C. न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना अकेले असहमत न्यायाधीश थे, जिन्होंने कहा कि प्रवर्तन निलंबित करके जीवन के अधिकार को मिटाया नहीं जा सकता।
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Sources
- भारत का संविधान: अनुच्छेद 21, 21A और 359 (विधायी विभाग, भारत सरकार)
- सर्वोच्च न्यायालय: मेनका गांधी बनाम भारत संघ, (1978) 1 SCC 248
- सर्वोच्च न्यायालय: न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017), नौ न्यायाधीशों की पीठ
- सर्वोच्च न्यायालय: कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018), पाँच न्यायाधीशों की पीठ
- Supreme Court Observer: अनुच्छेद 21 से संबंधित निर्णयों की समय-रेखा
Useful books for this topic
- Bare acts of the new criminal laws (BNS, BNSS, BSA)
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