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केशवानंद भारती मामला (1973): मूल ढांचा सिद्धांत

केशवानंद भारती मामला (1973): मूल ढांचा सिद्धांत

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केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का निर्णय 24 अप्रैल 1973 को सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने दिया। न्यायालय ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, पर संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) को बदल या नष्ट नहीं कर सकती। यह निर्णय 7:6 के बहुमत से हुआ, इसने गोलकनाथ (1967) को उलटा, और आज भी संविधान संशोधनों की न्यायिक समीक्षा की नींव है।

पृष्ठभूमि: संशोधन शक्ति पर टकराव

1950 के दशक से भूमि सुधार और संपत्ति के अधिकार को लेकर संसद और सर्वोच्च न्यायालय के बीच खींचतान चल रही थी। संसद भूमि सुधार कानूनों को बचाने के लिए संविधान में संशोधन करती रही, और न्यायालय परखता रहा कि क्या ऐसे संशोधन मौलिक अधिकारों को घटा सकते हैं।

शंकरी प्रसाद (1951) और सज्जन सिंह (1965) में न्यायालय ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है। फिर आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) में 11 न्यायाधीशों की पीठ ने 6:5 से कहा कि संविधान संशोधन भी अनुच्छेद 13 के अर्थ में “विधि” है, इसलिए संसद मौलिक अधिकार छीन या कम नहीं कर सकती।

संसद ने इसके जवाब में कई संशोधन किए:

  • 24वाँ संशोधन (1971): घोषित किया कि अनुच्छेद 368 के तहत किए गए संशोधनों पर अनुच्छेद 13 लागू नहीं होता, और संसद किसी भी उपबंध में संशोधन कर सकती है।
  • 25वाँ संशोधन (1971): अनुच्छेद 31(2) में “प्रतिकर” (Compensation) के स्थान पर “राशि” (Amount) शब्द रखा, और अनुच्छेद 31C जोड़ा, जो कुछ नीति निदेशक तत्वों को लागू करने वाले कानूनों को संरक्षण देता था और ऐसी घोषणा वाले कानून पर न्यायालय में प्रश्न उठाने से रोकता था।
  • 29वाँ संशोधन (1972): केरल के दो भूमि सुधार कानूनों को नौवीं अनुसूची में डाला।

मामले के तथ्य

स्वामी केशवानंद भारती केरल के कासरगोड स्थित एडनीर मठ के प्रमुख थे। मठ की भूमि केरल के भूमि सुधार कानूनों से प्रभावित हुई। उन्होंने इन कानूनों को चुनौती दी, और याचिका आगे चलकर 24वें, 25वें और 29वें संशोधनों की वैधता की चुनौती बन गई। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन.ए. पालखीवाला ने बहस की।

गोलकनाथ पर पुनर्विचार के लिए 13 न्यायाधीशों की पीठ बनी, जो न्यायालय के इतिहास में सबसे बड़ी है। सुनवाई 68 दिन चली, 31 अक्टूबर 1972 से 23 मार्च 1973 तक। निर्णय 24 अप्रैल 1973 को आया। उद्धरण: (1973) 4 SCC 225 और AIR 1973 SC 1461।

पीठ और 7:6 का विभाजन

बहुमत (7)अल्पमत (6)
मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सीकरी, जे.एम. शेलट, के.एस. हेगड़े, ए.एन. ग्रोवर, बी. जगनमोहन रेड्डी, ए.के. मुखर्जी, एच.आर. खन्नाए.एन. रे, डी.जी. पालेकर, के.के. मैथ्यू, एम.एच. बेग, एस.एन. द्विवेदी, वाई.वी. चंद्रचूड़

न्यायाधीशों ने कई अलग-अलग मत लिखे। बहुमत के छह न्यायाधीशों ने संशोधन शक्ति पर निहित सीमाएँ (Implied Limitations) मानीं, जबकि अल्पमत के छह ने कोई सीमा नहीं मानी। निर्णायक मत न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना का था: उन्होंने माना कि संसद मौलिक अधिकारों सहित हर उपबंध में संशोधन कर सकती है, पर “संशोधन” शब्द में संविधान को समाप्त करने या उसके मूल ढांचे को बदलने की शक्ति शामिल नहीं है। इसी से बहुमत बना।

तेरह में से नौ न्यायाधीशों ने “View by the majority” शीर्षक वाले एक संक्षिप्त सारांश पर हस्ताक्षर किए। इसका मुख्य वाक्य था कि अनुच्छेद 368 संसद को संविधान के मूल ढांचे या रूपरेखा को बदलने की शक्ति नहीं देता।

न्यायालय ने क्या निर्णय दिया

  • गोलकनाथ उलटा गया: संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ में “विधि” नहीं है। संसद भाग III सहित किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है।
  • 24वाँ संशोधन वैध ठहराया गया।
  • 25वाँ संशोधन: “प्रतिकर” के स्थान पर “राशि” शब्द और अनुच्छेद 31C का पहला भाग वैध रहा। पर 31C का दूसरा भाग, जो केवल इस घोषणा के आधार पर न्यायिक समीक्षा रोकता था कि कानून नीति निदेशक तत्वों को लागू करता है, असंवैधानिक घोषित हुआ।
  • 29वाँ संशोधन वैध ठहराया गया।
  • मूल ढांचे की सीमा: अनुच्छेद 368 की संशोधन शक्ति से संविधान के मूल ढांचे को क्षति या विनाश नहीं पहुँचाया जा सकता।

“मूल ढांचा” क्या है?

यह शब्द संविधान में कहीं नहीं लिखा है। न्यायालय ने कोई बंद सूची नहीं दी। बहुमत के अलग-अलग न्यायाधीशों ने संविधान की सर्वोच्चता, गणतंत्रात्मक और लोकतांत्रिक शासन, पंथनिरपेक्षता, शक्तियों का पृथक्करण और संघीय स्वरूप जैसी विशेषताओं का उल्लेख किया। बाद के निर्णयों ने न्यायिक पुनर्विलोकन, विधि का शासन, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा स्वयं संशोधन शक्ति की सीमितता जैसी विशेषताएँ जोड़ीं।

न्यायालय ने इस सूची को सदा खुला माना है। कोई विशेषता मूल है या नहीं, यह मामले-दर-मामले तय होता है।

निर्णय के बाद

न्यायाधीशों का अधिक्रमण

निर्णय के दो दिन बाद, 26 अप्रैल 1973 को, अल्पमत में रहे न्यायमूर्ति ए.एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। बहुमत के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों, शेलट, हेगड़े और ग्रोवर, का अधिक्रमण (Supersession) हुआ। इसे व्यापक रूप से निर्णय की प्रतिक्रिया माना गया।

इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975)

पहली बार मूल ढांचा सिद्धांत से किसी संशोधन को रद्द किया गया। न्यायालय ने 39वें संशोधन के उस भाग को अमान्य किया जो प्रधानमंत्री के चुनाव को न्यायिक जाँच से बाहर करना चाहता था, क्योंकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव मूल ढांचे का भाग हैं।

42वाँ संशोधन और मिनर्वा मिल्स (1980)

42वें संशोधन (1976) ने अनुच्छेद 368 में खंड (4) और (5) जोड़कर संशोधनों पर न्यायालयी प्रश्न रोकने और संशोधन शक्ति को असीमित घोषित करने का प्रयास किया। मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (31 जुलाई 1980) में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने इन खंडों को रद्द किया और कहा कि सीमित संशोधन शक्ति स्वयं मूल विशेषता है; सीमित शक्ति को असीमित में नहीं बदला जा सकता।

वामन राव और आई.आर. कोएल्हो

केशवानंद निर्णय की तिथि एक विधिक विभाजन रेखा बन गई। वामन राव (1981) में न्यायालय ने नौवीं अनुसूची के परिवर्धनों को मूल ढांचे पर परखने के लिए 24 अप्रैल 1973 को विभाजन रेखा माना। आई.आर. कोएल्हो (2007) में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि इस तिथि के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानून भी मूल ढांचे की कसौटी पर परखे जा सकते हैं।

परीक्षा की दृष्टि से

  • संख्याएँ: 13 न्यायाधीश, 7:6 बहुमत, 24 अप्रैल 1973, 68 दिन की सुनवाई। CLAT और AIBE में ये सीधे प्रश्न बनते हैं।
  • संशोधनों का परिणाम: न्यायिक सेवा प्रारंभिक में पूछा जाता है कि कौन से संशोधन वैध रहे (24वाँ, 29वाँ) और 25वें का कौन सा भाग (अनुच्छेद 31C का दूसरा भाग) रद्द हुआ।
  • कालक्रम: शंकरी प्रसाद, सज्जन सिंह, गोलकनाथ, केशवानंद, इंदिरा गांधी, मिनर्वा मिल्स, वामन राव, आई.आर. कोएल्हो। UGC NET में क्रम आधारित प्रश्न आम हैं।
  • न्यायमूर्ति खन्ना: उनका मत निर्णायक क्यों था, यह समझें, और इसे ए.डी.एम. जबलपुर (1976) की उनकी असहमति से न मिलाएँ।
  • संविधान में नहीं: “मूल ढांचा” न्यायिक सिद्धांत है, संविधान के पाठ में नहीं लिखा।

त्वरित प्रश्नोत्तरी

Q1. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य की सुनवाई कितने न्यायाधीशों ने की?

  1. 11
  2. 13
  3. 9
  4. 7
उत्तर देखें

उत्तर: B. 13 न्यायाधीशों की पीठ ने यह मामला तय किया, जो सर्वोच्च न्यायालय की अब तक की सबसे बड़ी पीठ है।

Q2. केशवानंद भारती में कौन सा पूर्व निर्णय उलटा गया?

  1. शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ
  2. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य
  3. ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य
  4. आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
उत्तर देखें

उत्तर: D. गोलकनाथ (1967) ने कहा था कि संसद मौलिक अधिकार कम नहीं कर सकती; केशवानंद ने यह मत उलट दिया।

Q3. केशवानंद भारती में 25वें संशोधन का कौन सा भाग रद्द हुआ?

  1. अनुच्छेद 31C का दूसरा भाग, जो न्यायिक समीक्षा रोकता था
  2. “प्रतिकर” के स्थान पर “राशि” शब्द
  3. पूरा अनुच्छेद 31C
  4. अनुच्छेद 31A का जोड़ा जाना
उत्तर देखें

उत्तर: A. अनुच्छेद 31C का पहला भाग वैध रहा, पर कानून के घोषित उद्देश्य की जाँच से न्यायालय को रोकने वाला भाग अमान्य हुआ।

Q4. किस मामले में कहा गया कि सीमित संशोधन शक्ति स्वयं मूल विशेषता है, और अनुच्छेद 368(4) व (5) रद्द हुए?

  1. इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण
  2. वामन राव बनाम भारत संघ
  3. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
  4. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ
उत्तर देखें

उत्तर: C. मिनर्वा मिल्स (1980) ने 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए उन खंडों को अमान्य किया जो संशोधन शक्ति को असीमित बनाना चाहते थे।

Q5. केशवानंद भारती में 7:6 का बहुमत बनाने में किस न्यायाधीश का मत निर्णायक माना जाता है?

  1. मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सीकरी
  2. न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना
  3. न्यायमूर्ति ए.एन. रे
  4. न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़
उत्तर देखें

उत्तर: B. न्यायमूर्ति खन्ना ने निहित सीमाएँ नहीं मानीं, पर कहा कि मूल ढांचा बदला नहीं जा सकता, और इसी से संतुलन बहुमत की ओर झुका।

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Sources

  • सर्वोच्च न्यायालय: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, (1973) 4 SCC 225; AIR 1973 SC 1461
  • सर्वोच्च न्यायालय: मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ, AIR 1980 SC 1789
  • भारत का संविधान: अनुच्छेद 13, 31C और 368; संविधान (24वाँ, 25वाँ और 29वाँ संशोधन) अधिनियम
  • LiveLaw: केशवानंद भारती निर्णय की 50वीं वर्षगाँठ पर टिप्पणी (अप्रैल 2023)

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