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पुरानी IPC की धारा 323 (स्वेच्छा से उपहति कारित करने का दंड) अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2) है, और IPC 321 वाली परिभाषा अब धारा 115(1) में है। कारावास पहले जैसा एक वर्ष तक ही है, लेकिन अधिकतम जुर्माना एक हजार रुपये से बढ़ाकर दस हजार रुपये कर दिया गया है। यह अपराध असंज्ञेय, जमानती, घायल व्यक्ति द्वारा शमनीय और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
एक नजर में बदलाव
IPC में तीन धाराएँ मिलकर काम करती थीं: धारा 319 “उपहति” (hurt) की परिभाषा देती थी, धारा 321 “स्वेच्छा से उपहति कारित करना” परिभाषित करती थी, और धारा 323 उसकी सजा बताती थी। BNS में धारा 114 उपहति की परिभाषा देती है, और धारा 115 में ही परिभाषा (उपधारा 1) और सजा (उपधारा 2) दोनों हैं।
उपहति (Hurt) क्या है
धारा 114 BNS पुरानी परिभाषा को बनाए रखती है: किसी व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा, रोग या अंग-शैथिल्य (infirmity) कारित करना उपहति है। इससे तीन बातें निकलती हैं:
- दिखने वाली चोट जरूरी नहीं। दर्द देने वाला एक थप्पड़ भी पर्याप्त है।
- रोग या शारीरिक अक्षमता भी उपहति में आती है, जैसे जानबूझकर किसी को बीमारी लगाना।
- केवल मानसिक कष्ट, बिना शारीरिक पीड़ा, रोग या अक्षमता के, इस परिभाषा में उपहति नहीं है।
उपहति “स्वेच्छा से” कब मानी जाएगी: धारा 115(1)
जब कोई व्यक्ति इस आशय (intention) से कोई कार्य करता है कि किसी को उपहति हो, या यह जानते हुए करता है कि उससे उपहति होना संभाव्य है, और वास्तव में उपहति हो जाती है, तो वह स्वेच्छा से उपहति कारित करता है। यानी दो मानसिक स्थितियाँ पर्याप्त हैं: आशय या संभाव्यता का ज्ञान। शुद्ध दुर्घटना इसके बाहर है।
उदाहरण: बहस के दौरान राम ने श्याम को धक्का दिया, यह जानते हुए कि वह गिर सकता है। श्याम गिरा और उसके टखने में मोच आ गई। राम ने स्वेच्छा से उपहति कारित की, भले ही वह विशेष रूप से मोच नहीं चाहता था।
सजा: धारा 115(2)
स्वेच्छा से उपहति कारित करने पर किसी भी भाँति (सादा या कठोर) का एक वर्ष तक का कारावास, या दस हजार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। गंभीर और अचानक प्रकोपन (grave and sudden provocation) पर दी गई उपहति के मामले धारा 122 में आते हैं, जहाँ सजा कम है, इसलिए वे धारा 115(2) से बाहर रखे गए हैं।
IPC 323 की तुलना में क्या बदला
- जुर्माना दस गुना: IPC 323 में अधिकतम एक हजार रुपये था, BNS 115(2) में दस हजार रुपये।
- कारावास वही: एक वर्ष तक, किसी भी भाँति का।
- ढाँचा: परिभाषा और सजा अब एक ही धारा की दो उपधाराओं में हैं।
पुरानी बनाम नई: वर्गीकरण तालिका
| पुरानी IPC | नई BNS | अपराध | सजा | संज्ञेय या असंज्ञेय | जमानती या गैर-जमानती | विचारण न्यायालय |
|---|---|---|---|---|---|---|
| 319 | 114 | उपहति की परिभाषा | लागू नहीं | लागू नहीं | लागू नहीं | लागू नहीं |
| 321 | 115(1) | स्वेच्छा से उपहति कारित करने की परिभाषा | लागू नहीं | लागू नहीं | लागू नहीं | लागू नहीं |
| 323 | 115(2) | स्वेच्छा से उपहति कारित करना | 1 वर्ष तक कारावास, या 10,000 रुपये तक जुर्माना, या दोनों | असंज्ञेय (non-cognizable) | जमानती (bailable) | कोई भी मजिस्ट्रेट |
BNSS की धारा 359(1) के अनुसार धारा 115(2) का अपराध वह व्यक्ति, जिसे उपहति हुई है, न्यायालय की अनुमति के बिना शमन (compound) कर सकता है।
मिलती-जुलती धाराएँ जिनमें छात्र उलझते हैं
- घोर उपहति (grievous hurt): परिभाषा धारा 116 BNS (पुरानी IPC 320), सजा धारा 117(2) (पुरानी IPC 325)।
- खतरनाक आयुध या साधनों से उपहति: धारा 118(1) BNS (पुरानी IPC 324)। यह संज्ञेय और गैर-जमानती है, यानी साधारण उपहति से कहीं गंभीर।
- प्रकोपन पर उपहति: धारा 122 BNS (पुरानी IPC 334 और 335)।
- हमला और आपराधिक बल: बल, आपराधिक बल और हमले की परिभाषा धारा 128 से 130 BNS में है और सजा धारा 131 में (तीन माह तक, या एक हजार रुपये तक जुर्माना, या दोनों)। थप्पड़ से दर्द हुआ तो उपहति है; बिना दर्द के धक्का केवल आपराधिक बल हो सकता है।
असंज्ञेय होने का व्यावहारिक अर्थ
साधारण उपहति असंज्ञेय है, इसलिए पुलिस स्वयं प्राथमिकी (FIR) दर्ज करके जाँच नहीं कर सकती। BNSS की धारा 174 (पुरानी CrPC 155) के अनुसार थानाध्यक्ष सूचना का सार एक रजिस्टर में दर्ज करता है, जिसे बोलचाल में NCR (असंज्ञेय रिपोर्ट) कहते हैं, और सूचनाकर्ता को मजिस्ट्रेट के पास भेजता है। मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही पुलिस जाँच कर सकती है।
लेकिन यदि उसी घटना में कोई संज्ञेय अपराध भी है, जैसे धारा 118(1) में हथियार से उपहति, तो पूरा मामला संज्ञेय माना जाता है और FIR दर्ज होती है।
चोट लगी है तो क्या करें
- तुरंत मेडिकल जाँच कराएँ: सरकारी अस्पताल की मेडिको-लीगल रिपोर्ट चोट की प्रकृति दर्ज करती है और यही तय करती है कि मामला साधारण उपहति का है या उससे गंभीर।
- थाने में लिखित शिकायत दें: यदि केवल साधारण उपहति बनती है तो NCR प्रविष्टि की प्रति माँगें।
- मजिस्ट्रेट के पास जाएँ: आप मजिस्ट्रेट के सामने परिवाद (complaint) दायर कर सकते हैं, या मजिस्ट्रेट पुलिस जाँच का आदेश दे सकते हैं।
- सबूत सुरक्षित रखें: CCTV फुटेज जल्दी माँगें क्योंकि कई सिस्टम कुछ दिनों में रिकॉर्डिंग मिटा देते हैं; फोटो, फटे कपड़े और गवाहों के नाम भी रखें।
- समझौता वैध है: अपराध घायल व्यक्ति द्वारा शमनीय है, इसलिए वास्तविक समझौते से मामला समाप्त हो सकता है।
परीक्षा की दृष्टि से
- धारा 114 उपहति की परिभाषा, 115(1) स्वेच्छा से उपहति की परिभाषा, 115(2) सजा।
- 115(2) में अधिकतम जुर्माना 10,000 रुपये है (IPC 323 में 1,000 रुपये)। यह एक-पंक्ति वाला पसंदीदा MCQ है।
- वर्गीकरण: असंज्ञेय, जमानती, कोई भी मजिस्ट्रेट, और घायल व्यक्ति द्वारा बिना अनुमति शमनीय।
- 115(2) को 118(1) (खतरनाक आयुध) या 117(2) (घोर उपहति) से न मिलाएँ।
- असंज्ञेय सूचना की प्रक्रिया BNSS धारा 174 में है।
त्वरित प्रश्नोत्तरी
Q1. IPC 323 के दंड प्रावधान के स्थान पर BNS का कौन-सा प्रावधान है?
- धारा 115(2)
- धारा 114
- धारा 117(2)
- धारा 118(1)
उत्तर देखें
उत्तर: A. धारा 115(2) स्वेच्छा से उपहति कारित करने की सजा बताती है, जो पहले IPC 323 में थी।
Q2. धारा 115(2) BNS में अधिकतम जुर्माना कितना है?
- 1,000 रुपये
- 5,000 रुपये
- 50,000 रुपये
- 10,000 रुपये
उत्तर देखें
उत्तर: D. जुर्माना दस हजार रुपये तक हो सकता है, जबकि IPC 323 में यह एक हजार रुपये था।
Q3. BNSS की पहली अनुसूची के अनुसार धारा 115(2) BNS का अपराध:
- संज्ञेय और गैर-जमानती
- संज्ञेय और जमानती
- असंज्ञेय और जमानती
- असंज्ञेय और गैर-जमानती
उत्तर देखें
उत्तर: C. साधारण उपहति असंज्ञेय और जमानती है, और कोई भी मजिस्ट्रेट इसका विचारण कर सकता है।
Q4. BNS की कौन-सी धारा “घोर उपहति” (grievous hurt) को परिभाषित करती है?
- धारा 114
- धारा 116
- धारा 115(1)
- धारा 122
उत्तर देखें
उत्तर: B. धारा 116 घोर उपहति की परिभाषा देती है; धारा 114 साधारण उपहति की।
Q5. असंज्ञेय मामलों में सूचना मिलने पर पुलिस की प्रक्रिया BNSS की किस धारा में है?
- धारा 173
- धारा 175
- धारा 35
- धारा 174
उत्तर देखें
उत्तर: D. धारा 174 BNSS (पुरानी CrPC 155) असंज्ञेय मामलों की सूचना और जाँच से संबंधित है।
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Sources
- भारतीय न्याय संहिता, 2023, धारा 114 से 118, 122 और 131 (India Code पर आधिकारिक पाठ)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, पहली अनुसूची, धारा 174 और धारा 359
- भारतीय दंड संहिता, 1860, धारा 319, 321 और 323 (तुलना के लिए)
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