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BNS धारा 316: आपराधिक न्यासभंग (पुरानी IPC 405 और 406)

BNS धारा 316: आपराधिक न्यासभंग (पुरानी IPC 405 और 406)

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आपराधिक न्यासभंग (criminal breach of trust) से जुड़ी पुरानी IPC की धारा 405 से 409 अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की एक धारा 316 में हैं। धारा 316(1) परिभाषा है (पुरानी 405) और धारा 316(2) सामान्य सजा है (पुरानी 406), जिसे BNS ने तीन वर्ष से बढ़ाकर पाँच वर्ष कर दिया है। यह अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती और प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

IPC की पाँच धाराएँ, BNS की एक धारा

IPC में आपराधिक न्यासभंग पाँच अलग धाराओं में था। BNS ने इन्हें धारा 316 की पाँच उपधाराओं में रख दिया:

  • 316(1): परिभाषा (पुरानी 405)
  • 316(2): सामान्य सजा (पुरानी 406)
  • 316(3): वाहक, घाटवाल (wharfinger) या भांडागारिक (warehouse-keeper) द्वारा न्यासभंग (पुरानी 407)
  • 316(4): लिपिक या सेवक द्वारा न्यासभंग (पुरानी 408)
  • 316(5): लोक सेवक, बैंकर, व्यापारी, फैक्टर, दलाल, अटर्नी या अभिकर्ता द्वारा न्यासभंग (पुरानी 409)

परिभाषा: धारा 316(1)

जिस व्यक्ति को कोई संपत्ति, या संपत्ति पर प्रभुत्व (dominion), किसी भी प्रकार से न्यस्त (entrusted) किया गया हो, वह यदि बेईमानी से इनमें से कुछ करे तो आपराधिक न्यासभंग करता है:

  • उस संपत्ति का दुर्विनियोग करे या उसे अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर ले;
  • न्यास के निर्वहन के तरीके के बारे में किसी विधिक निर्देश, या उससे संबंधित किसी विधिक संविदा (व्यक्त या विवक्षित) का उल्लंघन करते हुए उसका उपयोग या व्ययन करे;
  • जानबूझकर किसी दूसरे को ऐसा करने दे।

दो मूल तत्व

  • न्यस्त करना (entrustment): संपत्ति अभियुक्त को भरोसे पर सौंपी गई हो या उसके नियंत्रण में दी गई हो। न्यस्त किए बिना न्यासभंग नहीं होता।
  • बेईमानी से दुर्विनियोग: संपत्ति मिलने के बाद अभियुक्त बेईमानी से उसका दुरुपयोग करे। केवल पैसा न लौटा पाना या संविदा भंग पर्याप्त नहीं है।

भविष्य निधि और ESI कटौती

दो स्पष्टीकरण नियोक्ताओं से संबंधित हैं। जो नियोक्ता कर्मचारी के वेतन से भविष्य निधि (provident fund), कुटुंब पेंशन निधि या कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) निधि का अंशदान काटता है, उसे उस राशि का न्यासी माना जाता है। कानून के अनुसार जमा न करने पर माना जाएगा कि उसने बेईमानी से उसका उपयोग किया। ये स्पष्टीकरण IPC 405 में भी थे।

सजा

  • 316(2), सामान्य: किसी भी भाँति का पाँच वर्ष तक कारावास, या जुर्माना, या दोनों। IPC 406 में अधिकतम तीन वर्ष था। यही मुख्य बदलाव है।
  • 316(3), वाहक, घाटवाल, भांडागारिक: सात वर्ष तक और जुर्माना।
  • 316(4), लिपिक या सेवक: सात वर्ष तक और जुर्माना।
  • 316(5), लोक सेवक, बैंकर, व्यापारी, अभिकर्ता आदि: आजीवन कारावास, या दस वर्ष तक, और जुर्माना।

पुरानी बनाम नई: तालिका और वर्गीकरण

पुरानी IPCनई BNSअपराधसजासंज्ञेय या असंज्ञेयजमानती या गैर-जमानतीविचारण न्यायालय
405316(1)आपराधिक न्यासभंग की परिभाषालागू नहींलागू नहींलागू नहींलागू नहीं
406316(2)आपराधिक न्यासभंग5 वर्ष तक, या जुर्माना, या दोनोंसंज्ञेयगैर-जमानतीप्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
407316(3)वाहक, घाटवाल आदि द्वारा न्यासभंग7 वर्ष तक और जुर्मानासंज्ञेयगैर-जमानतीप्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
408316(4)लिपिक या सेवक द्वारा न्यासभंग7 वर्ष तक और जुर्मानासंज्ञेयगैर-जमानतीप्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
409316(5)लोक सेवक, बैंकर, व्यापारी, अभिकर्ता आदि द्वारा न्यासभंगआजीवन, या 10 वर्ष तक, और जुर्मानासंज्ञेयगैर-जमानतीप्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट

BNSS धारा 359 के अंतर्गत शमन

  • 316(3): संपत्ति का स्वामी बिना न्यायालय की अनुमति शमन कर सकता है।
  • 316(2) और 316(4): स्वामी शमन कर सकता है, पर केवल न्यायालय की अनुमति से।
  • 316(5): अशमनीय।

BNS में क्या बदला

  • पाँच धाराएँ अब पाँच उपधाराओं वाली एक धारा हैं।
  • सामान्य सजा तीन वर्ष (IPC 406) से बढ़कर पाँच वर्ष (BNS 316(2)) हुई।
  • गंभीर रूपों की सजा पहले जैसी है।
  • 316(2) में अधिकतम सजा अब पाँच वर्ष होने से यह अपराध तीन से सात वर्ष वाली श्रेणी में आ गया है, जहाँ BNSS धारा 173(3) के तहत पुलिस DSP की अनुमति से FIR से पहले प्रारंभिक जाँच कर सकती है।

न्यासभंग या छल? अदालतों का सबसे आम प्रश्न

छल (cheating) अब BNS धारा 318 है (पुरानी IPC 415 और 420)। अंतर इस पर टिका है कि बेईमानी कब शुरू हुई:

  • छल: अभियुक्त शुरू से ही धोखा देता है और पीड़ित उसी धोखे के कारण संपत्ति सौंपता है।
  • न्यासभंग: संपत्ति ईमानदारी से और वैध रूप से सौंपी जाती है; बेईमानी बाद में आती है जब अभियुक्त उसका दुर्विनियोग करता है।

दिल्ली रेस क्लब (1940) लि. बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2024 INSC 626 में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट किया कि दोनों अपराधों की नींव अलग है और सामान्यतः एक ही तथ्यों पर दोनों साथ नहीं बन सकते। अदालत ने दोहराया कि बिना बेईमान आशय के केवल व्यावसायिक विवाद या संविदा भंग दीवानी मामला है, अपराध नहीं।

प्रतिभा रानी बनाम सूरज कुमार (1985) 2 SCC 370 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पत्नी का स्त्रीधन पति या ससुराल वालों के पास रखा होने पर भी उसकी पूर्ण संपत्ति रहता है, और उसे बेईमानी से रोक लेना आपराधिक न्यासभंग हो सकता है।

आपका पैसा या संपत्ति हड़प ली गई? व्यावहारिक कदम

  • सौंपने का सबूत जुटाएँ: करार, रसीदें, बैंक ट्रांसफर, ईमेल या संदेश जो दिखाएँ कि संपत्ति किसी विशेष प्रयोजन के लिए दी गई थी।
  • दुरुपयोग का सबूत: लौटाने की माँग और इनकार, बेचने या अन्यत्र लगाने के प्रमाण, हिसाब-किताब।
  • थाने में लिखित शिकायत दें: न्यासभंग संज्ञेय है, इसलिए प्राथमिकी दर्ज हो सकती है। तीन से सात वर्ष की श्रेणी होने से पुलिस पहले DSP की अनुमति से 14 दिन में प्रारंभिक जाँच कर सकती है।
  • पुलिस कार्रवाई न करे तो: BNSS धारा 173(4) के तहत शिकायत डाक से पुलिस अधीक्षक को भेजें, फिर धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास जाएँ और SP को दिए आवेदन की प्रति शपथपत्र के साथ लगाएँ।
  • दीवानी उपाय भी: तथ्यों के अनुसार वसूली का वाद आपराधिक मामले के साथ चल सकता है।

परीक्षा की दृष्टि से

  • मिलान: 405 से 316(1), 406 से 316(2), 407 से 316(3), 408 से 316(4), 409 से 316(5)।
  • सजा में बदलाव: IPC 406 में 3 वर्ष, BNS 316(2) में 5 वर्ष।
  • सभी दंड उपधाराएँ संज्ञेय, गैर-जमानती और प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय।
  • न्यस्त करना (entrustment) ही न्यासभंग को चोरी और छल से अलग करता है।
  • शमन: 316(3) बिना अनुमति; 316(2) और 316(4) अनुमति से; 316(5) अशमनीय।

त्वरित प्रश्नोत्तरी

Q1. धारा 316(2) BNS में आपराधिक न्यासभंग की अधिकतम सजा क्या है?

  1. पाँच वर्ष, या जुर्माना, या दोनों
  2. तीन वर्ष, या जुर्माना, या दोनों
  3. सात वर्ष और जुर्माना
  4. दस वर्ष और जुर्माना
उत्तर देखें

उत्तर: A. BNS ने सामान्य सजा IPC 406 के तीन वर्ष से बढ़ाकर पाँच वर्ष कर दी है।

Q2. लिपिक या सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग (पुरानी IPC 408) अब किस प्रावधान में है?

  1. धारा 316(3)
  2. धारा 316(5)
  3. धारा 316(4)
  4. धारा 306
उत्तर देखें

उत्तर: C. धारा 316(4) लिपिक या सेवक द्वारा न्यासभंग पर सात वर्ष तक और जुर्माने का प्रावधान करती है। धारा 306 लिपिक या सेवक द्वारा चोरी है।

Q3. BNSS की पहली अनुसूची के अनुसार धारा 316(2) BNS का अपराध किसके द्वारा विचारणीय है?

  1. सत्र न्यायालय
  2. प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
  3. कोई भी मजिस्ट्रेट
  4. उच्च न्यायालय
उत्तर देखें

उत्तर: B. धारा 316 की सभी दंड उपधाराएँ प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय हैं, और ये संज्ञेय व गैर-जमानती हैं।

Q4. आपराधिक न्यासभंग को छल से अलग करने वाला मूल तत्व है:

  1. बल का प्रयोग
  2. संपत्ति का मूल्य एक सीमा से अधिक होना
  3. लोक सेवक की संलिप्तता
  4. पहले वैध रूप से न्यस्त करना और बाद में बेईमानी से दुर्विनियोग
उत्तर देखें

उत्तर: D. न्यासभंग में संपत्ति पहले वैध रूप से सौंपी जाती है और बेईमानी बाद में आती है; छल में धोखा शुरू से होता है।

Q5. धारा 316(5) BNS (लोक सेवक, बैंकर आदि द्वारा न्यासभंग) के बारे में कौन-सा कथन सही है?

  1. यह बिना अनुमति शमनीय है
  2. यह जमानती है
  3. यह अशमनीय है और इसमें आजीवन कारावास तक हो सकता है
  4. इसमें अधिकतम सात वर्ष की सजा है
उत्तर देखें

उत्तर: C. 316(5) BNSS धारा 359 की किसी तालिका में नहीं है, और इसमें आजीवन कारावास या दस वर्ष तक और जुर्माना है।

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Sources

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023, धारा 316 और 318 (India Code पर आधिकारिक पाठ)
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, पहली अनुसूची, धारा 173, 175(3) और 359
  • सर्वोच्च न्यायालय: दिल्ली रेस क्लब (1940) लि. बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2024 INSC 626
  • सर्वोच्च न्यायालय: प्रतिभा रानी बनाम सूरज कुमार (1985) 2 SCC 370

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