English में पढ़ें: Read in English
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 318 छल (Cheating) से जुड़ा प्रावधान है। उप-धारा (1) में छल की परिभाषा है, और उप-धारा (2), (3) और (4) में क्रमशः 3, 5 और 7 वर्ष तक के कारावास का दंड है। पुरानी IPC की धारा 420 अब BNS की धारा 318(4) बन गई है, जो छल करके संपत्ति सौंपने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करने पर लागू होती है।
धारा 318 की पृष्ठभूमि
1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता ने भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) का स्थान ले लिया है। IPC में छल से जुड़े प्रावधान कई धाराओं में बिखरे हुए थे: धारा 415 में परिभाषा, धारा 417 में साधारण छल का दंड, धारा 418 में उस व्यक्ति से छल जिसके हित की रक्षा करना अभियुक्त का दायित्व था, और धारा 420 में छल द्वारा संपत्ति प्राप्त करना।
BNS ने इन सभी को एक ही धारा 318 में चार उप-धाराओं के रूप में समेट दिया है। प्रतिरूपण द्वारा छल (Cheating by Personation), जो IPC में धारा 416 और 419 में था, अब अलग से BNS की धारा 319 में है।
धारा 318 की चारों उप-धाराएँ
धारा 318(1): छल की परिभाषा
कोई व्यक्ति छल करता है जब वह किसी को धोखा देकर:
- कपटपूर्वक या बेईमानी से उसे उत्प्रेरित करता है कि वह किसी व्यक्ति को कोई संपत्ति सौंप दे, या किसी व्यक्ति द्वारा संपत्ति रखे जाने पर सहमति दे; अथवा
- जानबूझकर उसे ऐसा कोई कार्य करने या न करने के लिए उत्प्रेरित करता है जो वह धोखे में न होने पर नहीं करता, और उस कार्य या लोप से उस व्यक्ति के शरीर, मन, ख्याति या संपत्ति को क्षति या हानि होती है या होने की संभावना होती है।
स्पष्टीकरण (Explanation) के अनुसार “A dishonest concealment of facts is a deception”, यानी तथ्यों को बेईमानी से छिपाना भी धोखा है। इसलिए जहाँ बताने का दायित्व हो, वहाँ चुप रहना भी छल बन सकता है।
धारा 318(2): साधारण छल का दंड
तीन वर्ष तक का किसी भी भाँति का कारावास, या जुर्माना, या दोनों। पुरानी IPC धारा 417 में अधिकतम सजा केवल एक वर्ष थी।
धारा 318(3): जिसके हित की रक्षा का दायित्व हो, उससे छल
यह तब लागू होती है जब अभियुक्त यह जानते हुए छल करता है कि इससे ऐसे व्यक्ति को सदोष हानि (Wrongful Loss) होने की संभावना है जिसके हित की रक्षा करने के लिए वह विधि द्वारा या वैध संविदा द्वारा बाध्य था। उदाहरण: ट्रस्टी, एजेंट या संरक्षक। दंड: पाँच वर्ष तक कारावास, या जुर्माना, या दोनों। IPC धारा 418 में यह तीन वर्ष था।
धारा 318(4): छल करके संपत्ति सौंपने के लिए उत्प्रेरित करना
यह छल का गंभीर रूप है और IPC धारा 420 का सीधा उत्तराधिकारी है। यह तब लागू होती है जब छले गए व्यक्ति को बेईमानी से किसी को संपत्ति सौंपने, या किसी मूल्यवान प्रतिभूति (Valuable Security) को बनाने, बदलने या नष्ट करने के लिए उत्प्रेरित किया जाए। दंड: सात वर्ष तक का कारावास और साथ में जुर्माना भी। यहाँ जुर्माना अनिवार्य है, ठीक वैसे ही जैसे धारा 420 में था।
IPC 420 बनाम BNS 318: तुलनात्मक तालिका
| विषय | पुरानी IPC धारा | नई BNS धारा | अधिकतम सजा (IPC से BNS) |
|---|---|---|---|
| छल की परिभाषा | 415 | 318(1) | लागू नहीं |
| साधारण छल का दंड | 417 | 318(2) | 1 वर्ष से बढ़कर 3 वर्ष, या जुर्माना, या दोनों |
| जिसके हित की रक्षा का दायित्व हो, उसे सदोष हानि की जानकारी के साथ छल | 418 | 318(3) | 3 वर्ष से बढ़कर 5 वर्ष, या जुर्माना, या दोनों |
| छल करके संपत्ति सौंपने हेतु बेईमानी से उत्प्रेरित करना | 420 | 318(4) | 7 वर्ष और जुर्माना (कोई बदलाव नहीं) |
| प्रतिरूपण द्वारा छल | 416 और 419 | 319(1) और 319(2) | 3 वर्ष से बढ़कर 5 वर्ष, या जुर्माना, या दोनों |
अपराध के आवश्यक तत्व
धारा 318 के अंतर्गत अभियोजन को सामान्यतः ये बातें साबित करनी होती हैं:
- धोखा (Deception): पीड़ित के सामने झूठा प्रतिनिधित्व, या तथ्यों को बेईमानी से छिपाना।
- उत्प्रेरण (Inducement): पीड़ित ने उसी धोखे के कारण कोई कार्य किया या करने से रुका।
- उत्प्रेरण के समय कपटपूर्ण या बेईमान आशय: दोषपूर्ण मनःस्थिति वादा या प्रतिनिधित्व करते समय ही मौजूद होनी चाहिए, बाद में नहीं।
- परिणाम: संपत्ति का सौंपा जाना या रखा जाना, अथवा ऐसा कार्य या लोप जिससे शरीर, मन, ख्याति या संपत्ति को हानि हो या होने की संभावना हो।
व्यवहार में तीसरा तत्व ही अधिकांश मुकदमों का फैसला करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने IPC के उन्हीं प्रावधानों पर, जिन्हें धारा 318 आगे बढ़ाती है, बार-बार कहा है कि केवल संविदा भंग (Breach of Contract) छल नहीं है, जब तक कि लेन-देन की शुरुआत से ही बेईमान आशय न रहा हो। हृदय रंजन प्रसाद वर्मा बनाम बिहार राज्य, (2000) 4 SCC 168 में कार्यवाही इसीलिए रद्द की गई क्योंकि शिकायत में शुरुआत से ऐसा आशय नहीं दिखता था। यही सिद्धांत वी.वाई. जोस बनाम गुजरात राज्य (2009) और अनिल महाजन बनाम भोर इंडस्ट्रीज (2005) में भी दोहराया गया। चूँकि धारा 318 की भाषा IPC की धारा 415 से 420 जैसी ही है, ये निर्णय आज भी मार्गदर्शक हैं।
वर्गीकरण: संज्ञेय, जमानतीय और शमन
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की प्रथम अनुसूची के अनुसार:
| प्रावधान | संज्ञेय / असंज्ञेय | जमानतीय / अजमानतीय | विचारण | शमन (BNSS धारा 359) |
|---|---|---|---|---|
| 318(2) | असंज्ञेय | जमानतीय | कोई भी मजिस्ट्रेट | छले गए व्यक्ति द्वारा, न्यायालय की अनुमति के बिना |
| 318(3) | असंज्ञेय | जमानतीय | कोई भी मजिस्ट्रेट | छले गए व्यक्ति द्वारा, न्यायालय की अनुमति से |
| 318(4) | संज्ञेय | अजमानतीय | प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट | छले गए व्यक्ति द्वारा, न्यायालय की अनुमति से |
BNSS की धारा 359 ने CrPC की धारा 320 का स्थान लिया है। इसकी पहली तालिका में वे अपराध हैं जिनका शमन (Compounding) बिना न्यायालय की अनुमति के हो सकता है, और दूसरी तालिका में वे जिनके लिए अनुमति चाहिए। धारा 318(2) पहली तालिका में है, जबकि 318(3) और 318(4) दूसरी तालिका में।
सरल उदाहरण
- A स्वयं को सरकारी अधिकारी बताकर उधार पर सामान ले लेता है, जबकि उसका भुगतान करने का कोई इरादा नहीं है। यह संपत्ति प्राप्त करने वाला छल है, यानी धारा 318(4)।
- A ईमानदारी से अग्रिम राशि लेता है, पर बाद में व्यापार डूबने के कारण माल नहीं दे पाता। शुरुआत में बेईमान आशय न होने से यह दीवानी विवाद है, छल नहीं।
परीक्षा की दृष्टि से
- धारा मिलान: सबसे आम प्रश्न है: “IPC 420 के स्थान पर BNS की कौन सी धारा है?” उत्तर: 318(4)। साथ ही 415 का 318(1), 417 का 318(2) और 418 का 318(3) से मिलान याद रखें।
- बढ़ी हुई सजा: न्यायिक सेवा प्रारंभिक और AIBE में पूछा जाता है कि किन सजाओं में वृद्धि हुई: साधारण छल 1 से 3 वर्ष, और धारा 418 वाला छल 3 से 5 वर्ष। धारा 420 वाले छल में 7 वर्ष और अनिवार्य जुर्माना यथावत है।
- प्रतिरूपण: प्रतिरूपण द्वारा छल धारा 319 में है, 318 में नहीं। परीक्षक इसे भ्रमित करने वाले विकल्प के रूप में रखते हैं।
- दीवानी बनाम आपराधिक: न्यायिक सेवा मुख्य परीक्षा और CLAT के तथ्य-आधारित प्रश्नों में असफल अनुबंध दिया जाता है। उत्तर उत्प्रेरण के समय के आशय पर टिका होता है।
- प्रक्रिया: UGC NET और न्यायिक परीक्षाओं में शमन पर प्रश्न आते हैं: 318(2) बिना अनुमति, 318(3) और 318(4) अनुमति से, BNSS धारा 359 के अंतर्गत।
त्वरित प्रश्नोत्तरी
Q1. IPC की धारा 420 के स्थान पर BNS का कौन सा प्रावधान है?
- धारा 316(2)
- धारा 318(2)
- धारा 319(2)
- धारा 318(4)
उत्तर देखें
उत्तर: D. छल करके बेईमानी से संपत्ति सौंपने के लिए उत्प्रेरित करना, जो पहले IPC 420 था, अब BNS की धारा 318(4) है।
Q2. BNS धारा 318(2) के अंतर्गत साधारण छल की अधिकतम सजा क्या है?
- 1 वर्ष, या जुर्माना, या दोनों
- 3 वर्ष, या जुर्माना, या दोनों
- 5 वर्ष और जुर्माना
- 7 वर्ष और जुर्माना
उत्तर देखें
उत्तर: B. धारा 318(2) ने अधिकतम सजा IPC 417 के 1 वर्ष से बढ़ाकर 3 वर्ष कर दी है।
Q3. धारा 318(1) के स्पष्टीकरण के अनुसार निम्न में से क्या धोखा है?
- तथ्यों को बेईमानी से छिपाना
- केवल लिखित झूठा कथन
- केवल शपथ पर दिया गया मौखिक झूठा कथन
- वादे को बाद में किसी भी कारण से पूरा न कर पाना
उत्तर देखें
उत्तर: A. स्पष्टीकरण स्पष्ट कहता है कि तथ्यों का बेईमान छिपाव भी इस धारा के अर्थ में धोखा है।
Q4. BNS में प्रतिरूपण द्वारा छल (Cheating by Personation) किस धारा में है?
- धारा 318(3)
- धारा 316
- धारा 319
- धारा 320
उत्तर देखें
उत्तर: C. BNS की धारा 319 प्रतिरूपण द्वारा छल से संबंधित है और इसने IPC की धारा 416 और 419 का स्थान लिया है।
Q5. BNSS धारा 359 के अंतर्गत BNS धारा 318(4) का अपराध:
- शमनीय ही नहीं है
- छले गए व्यक्ति द्वारा न्यायालय की अनुमति से शमनीय है
- छले गए व्यक्ति द्वारा बिना अनुमति शमनीय है
- केवल राज्य द्वारा शमनीय है
उत्तर देखें
उत्तर: B. धारा 318(4) BNSS धारा 359 की दूसरी तालिका में है, इसलिए इसका शमन न्यायालय की अनुमति से ही हो सकता है।
और अभ्यास करें
BNS, BNSS और BSA की धाराएँ अब हर कानूनी परीक्षा में पूछी जाती हैं। हमारी नए आपराधिक कानून गाइड (हिंदी) में IPC, CrPC और साक्ष्य अधिनियम की हर धारा का नया नंबर दिया गया है, और AIBE XXII का मुफ़्त मॉक टेस्ट इन्हें परीक्षा के समय में परखता है।
रोज़ एक कानूनी MCQ, मुफ़्त, Telegram पर
CLAT, AIBE, NET और न्यायिक सेवा के लिए रोज़ एक प्रश्न उत्तर सहित, साथ में परीक्षा तिथियों, एडमिट कार्ड और नए मुफ़्त मॉक की सूचना।
Sources
- भारतीय न्याय संहिता, 2023: धारा 318 और 319 (India Code)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023: धारा 359 और प्रथम अनुसूची
- भारतीय दंड संहिता, 1860: धारा 415 से 420
- सर्वोच्च न्यायालय: हृदय रंजन प्रसाद वर्मा बनाम बिहार राज्य, (2000) 4 SCC 168
Useful books for this topic
- Bare acts of the new criminal laws (BNS, BNSS, BSA)
- Code of Civil Procedure bare act
- Legal drafting and conveyancing books
- Constitution of India (coat pocket edition)
As an Amazon Associate, Lexfolio earns from qualifying purchases. Prices and availability are shown on Amazon.

Leave a Reply