दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 438 (अग्रिम जमानत) अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू है। अजमानती अपराध में गिरफ्तारी की आशंका होने पर व्यक्ति उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय से यह निर्देश मांग सकता है कि गिरफ्तारी होने पर उसे जमानत पर छोड़ा जाए। नई धारा छोटी है: उसमें पुराने विचारणीय कारक, लोक अभियोजक को अनिवार्य नोटिस और UP का पुराना प्रतिबंध नहीं है।
कोई भी धारा खोजें: पुरानी या नई धारा संख्या डालकर तुरंत उसका समकक्ष देखें, IPC से BNS कन्वर्टर में।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पुरानी धारा | CrPC धारा 438 |
| नई धारा | BNSS धारा 482(1) से 482(4) |
| कब आवेदन करें | जब अजमानती अपराध में गिरफ्तारी की उचित आशंका हो |
| किस अदालत में | सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय (समवर्ती अधिकारिता) |
| शर्तें | पूछताछ के लिए उपलब्ध रहना, गवाहों को प्रभावित न करना, बिना अनुमति देश न छोड़ना, धारा 480(3) की अन्य शर्तें |
| जहाँ लागू नहीं | BNS धारा 65 (16 वर्ष से कम आयु की बालिका से बलात्कार) और 70(2) (18 वर्ष से कम आयु की बालिका से सामूहिक बलात्कार) |
| समय सीमा | कोई निश्चित समय सीमा नहीं; FIR से पहले भी आवेदन संभव |
धारा 482 क्या कहती है
482(1): जिस व्यक्ति को यह विश्वास करने का कारण है कि उसे किसी अजमानती अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है, वह उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में आवेदन कर सकता है। अदालत उचित समझे तो निर्देश दे सकती है कि गिरफ्तारी की स्थिति में उसे “shall be released on bail”।
482(2): अदालत तथ्यों के अनुसार शर्तें लगा सकती है, जैसे पुलिस पूछताछ के लिए उपलब्ध रहना, मामले से जुड़े व्यक्तियों को धमकी या प्रलोभन न देना, अदालत की पूर्व अनुमति के बिना भारत न छोड़ना, और BNSS धारा 480(3) में दी गई अन्य शर्तें।
482(3): ऐसे व्यक्ति को थाने का भारसाधक अधिकारी बिना वारंट गिरफ्तार करे और वह जमानत देने को तैयार हो, तो उसे छोड़ना होगा। मजिस्ट्रेट वारंट जारी करना चाहे तो उसे अदालत के निर्देश के अनुरूप जमानती वारंट जारी करना होगा।
482(4): यह धारा BNS धारा 65 या धारा 70(2) के आरोप पर गिरफ्तारी में लागू नहीं होती।
CrPC 438 से क्या बदला
- विचारणीय कारक हटे: धारा 438(1) में आरोप की प्रकृति, आवेदक का आपराधिक इतिहास, फरार होने की संभावना और आरोप का उद्देश्य जैसे कारक लिखे थे। BNSS 482 में ये नहीं हैं। अदालतें इन्हें अब भी न्यायिक सिद्धांत के रूप में देखती हैं, पर विवेक का दायरा बढ़ा है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने परिशा त्रिवेदी (2024) में यही कहा।
- लोक अभियोजक को नोटिस और आवेदक की उपस्थिति: CrPC 438(1A) और (1B) में अंतरिम आदेश के बाद लोक अभियोजक को सात दिन का नोटिस और अंतिम सुनवाई पर आवेदक की उपस्थिति की व्यवस्था थी। BNSS 482 के पाठ में ये प्रावधान नहीं हैं, हालांकि व्यवहार में अदालतें अभियोजन को सुनती हैं।
- प्रतिबंधित अपराध: CrPC 438(4) IPC की धारा 376(3), 376AB, 376DA और 376DB पर लागू नहीं होती थी। BNSS 482(4) में अब BNS 65 और 70(2) हैं।
- उत्तर प्रदेश: UP संशोधन से जोड़ी गई धारा 438(6) मृत्युदंड या आजीवन कारावास वाले अपराधों में अग्रिम जमानत रोकती थी। BNSS में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
महत्वपूर्ण केस लॉ
- गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य ((1980) 2 SCC 565): संविधान पीठ ने कहा कि अग्रिम जमानत की शक्ति पर अदालतें अपनी ओर से कठोर सीमाएँ नहीं जोड़ सकतीं। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) से जुड़ा प्रावधान है।
- सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (दिल्ली) ((2020) 5 SCC 1): संविधान पीठ ने कहा कि अग्रिम जमानत को सामान्यतः किसी निश्चित अवधि तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, यह आरोप पत्र के बाद भी जारी रह सकती है, जब तक अदालत विशेष कारणों से अवधि तय न करे।
- अब्दुल हमीद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (इलाहाबाद उच्च न्यायालय, जुलाई 2025): UP की पुरानी 438(6) की रोक BNSS 482 में नहीं आई, इसलिए 1 जुलाई 2024 के बाद दायर आवेदन में मृत्युदंड या आजीवन कारावास वाले अपराधों में भी अग्रिम जमानत पर विचार हो सकता है।
- नज़ीर हुसैन बनाम असम राज्य (गौहाटी उच्च न्यायालय, 2025): 482(4) में “and” को “or” पढ़ा जाए, यानी BNS 65 या 70(2) में से किसी एक का आरोप होने पर भी अग्रिम जमानत का प्रावधान लागू नहीं होगा।
सीधे उच्च न्यायालय जा सकते हैं या नहीं
धारा 482 उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय दोनों को अधिकार देती है। व्यवहार में पहले सत्र न्यायालय जाना सामान्य परंपरा है। क्या उच्च न्यायालय सत्र न्यायालय को छोड़कर सीधे आवेदन सुन सकता है, यह प्रश्न मोहम्मद रसाल सी. बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ के सामने है, जिसने अक्टूबर 2026 में निर्णय सुरक्षित रखा है। निर्णय आने तक अपने उच्च न्यायालय की प्रचलित प्रथा देखें।
आम भ्रम
अग्रिम जमानत और नियमित जमानत में अंतर
नियमित जमानत (BNSS 480 और 483) गिरफ्तारी के बाद मांगी जाती है। अग्रिम जमानत गिरफ्तारी से पहले का आदेश है, जो गिरफ्तारी होने पर तुरंत लागू होता है।
क्या जमानती अपराध में अग्रिम जमानत चाहिए
नहीं। धारा 482 केवल अजमानती अपराधों के लिए है।
आम लोगों के लिए व्यावहारिक जानकारी
- दस्तावेज़: FIR की प्रति (हो तो), शिकायत या नोटिस की प्रति, पहचान पत्र, पता प्रमाण, और गिरफ्तारी की आशंका दिखाने वाले कागज़, जैसे पुलिस नोटिस या धमकी के संदेश।
- आवेदन में: अपना पक्ष, आपराधिक इतिहास न होना और जांच में सहयोग की तत्परता स्पष्ट लिखें।
- आदेश के बाद: शर्तों का पालन करें। पुलिस बुलाए तो उपस्थित हों, गवाहों से संपर्क न करें। उल्लंघन पर अग्रिम जमानत रद्द हो सकती है।
परीक्षा की दृष्टि से (Exam angle)
- CrPC 438 = BNSS 482। नियमित जमानत: CrPC 437 = BNSS 480, CrPC 439 = BNSS 483।
- 482(4) के अपवाद: BNS 65 और 70(2)।
- सिब्बिया (1980) और सुशीला अग्रवाल (2020) दोनों संविधान पीठ के निर्णय हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently asked questions)
अग्रिम जमानत की नई धारा क्या है?
CrPC की धारा 438 अब BNSS की धारा 482 है।
अग्रिम जमानत के लिए कहाँ आवेदन करें?
सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में। सामान्य प्रथा पहले सत्र न्यायालय जाने की है।
किन अपराधों में अग्रिम जमानत नहीं मिलती?
BNS धारा 65 (16 वर्ष से कम आयु की बालिका से बलात्कार) और धारा 70(2) (18 वर्ष से कम आयु की बालिका से सामूहिक बलात्कार) में धारा 482 लागू नहीं होती। कुछ विशेष कानूनों में भी अलग रोक है।
अग्रिम जमानत कितने समय तक रहती है?
सुशीला अग्रवाल (2020) के अनुसार सामान्यतः इसे समय सीमा में नहीं बाँधा जाता और यह मुकदमे के अंत तक चल सकती है, जब तक अदालत अलग आदेश न दे।
क्या UP में हत्या के केस में अग्रिम जमानत मिल सकती है?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2025 में कहा कि BNSS में UP वाली पुरानी रोक नहीं है, इसलिए आवेदन पर गुण-दोष के आधार पर विचार हो सकता है। अनुदान अदालत के विवेक पर है।
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क्विक क्विज़ (Quick quiz)
Q1. CrPC धारा 438 का BNSS में समकक्ष क्या है?
- धारा 480
- धारा 483
- धारा 528
- धारा 482
उत्तर देखें
उत्तर: D. अग्रिम जमानत अब BNSS धारा 482 में है। धारा 528 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति है।
Q2. BNSS 482(4) किन BNS धाराओं के आरोप पर लागू नहीं होती?
- धारा 65 और 70(2)
- धारा 103 और 109
- धारा 64 और 74
- धारा 80 और 85
उत्तर देखें
उत्तर: A. 482(4) BNS 65 और 70(2) को बाहर रखती है, जो नाबालिग बालिकाओं से बलात्कार और सामूहिक बलात्कार से संबंधित हैं।
Q3. अग्रिम जमानत को सामान्यतः समय सीमा में नहीं बाँधा जाना चाहिए, यह किस निर्णय में कहा गया?
- अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य
- सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (दिल्ली)
- सतेंदर कुमार अंतिल बनाम CBI
- नज़ीर हुसैन बनाम असम राज्य
उत्तर देखें
उत्तर: B. सुशीला अग्रवाल (2020) 5 SCC 1 में संविधान पीठ ने यह कहा।
Q4. अग्रिम जमानत का आदेश कौन दे सकता है?
- कोई भी मजिस्ट्रेट
- मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट
- उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय
- पुलिस अधीक्षक
उत्तर देखें
उत्तर: C. धारा 482(1) यह अधिकार केवल उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय को देती है।
Q5. 482(4) में “and” को “or” पढ़ने का निर्णय किस उच्च न्यायालय ने दिया?
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय
- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय
- केरल उच्च न्यायालय
- गौहाटी उच्च न्यायालय
उत्तर देखें
उत्तर: D. गौहाटी उच्च न्यायालय ने नज़ीर हुसैन बनाम असम राज्य (2025) में यह व्याख्या दी।
स्रोत (Sources)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, धारा 480, 482 और 483 (India Code)
- गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य, (1980) 2 SCC 565
- सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (दिल्ली), (2020) 5 SCC 1
- अब्दुल हमीद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, इलाहाबाद उच्च न्यायालय, 2025
- नज़ीर हुसैन बनाम असम राज्य, 2025 LiveLaw (Gau) 30
यह पृष्ठ शिक्षा और सामान्य जानकारी के लिए है, किसी विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं।
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