जब कोई हिंदू पुरुष बिना वसीयत के मर जाता है, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के अनुसार उसकी संपत्ति सबसे पहले वर्ग I (Class I) के वारिसों को मिलती है: मुख्य रूप से विधवा, बेटे, बेटियाँ और माँ, जो एक साथ और बराबर हिस्से में लेते हैं। पिता वर्ग II के वारिस हैं, यानी उन्हें तभी मिलता है जब वर्ग I में कोई न हो। हिंदू महिला की बिना वसीयत मृत्यु पर धारा 15 और 16 लागू होती हैं: पहले उसके बेटे, बेटियाँ और पति। 2005 से बेटी जन्म से ही पैतृक संपत्ति में सहदायिक (coparcener) है, बिल्कुल बेटे की तरह।
| बिंदु | स्थिति |
|---|---|
| किन पर लागू | हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 |
| पुरुष की बिना वसीयत मृत्यु | धारा 8: वर्ग I के वारिस पहले, एक साथ और बराबर |
| मुख्य वर्ग I वारिस | विधवा, बेटा, बेटी, माँ, और अनुसूची में लिखे पूर्व-मृत संतान के वारिस |
| पिता | वर्ग II के वारिस, वर्ग I न होने पर ही |
| महिला की बिना वसीयत मृत्यु | धारा 15 और 16: पहले बेटे, बेटियाँ (पूर्व-मृत संतान के बच्चे सहित) और पति |
| पैतृक संपत्ति में बेटी | जन्म से सहदायिक (धारा 6, 2005 संशोधन; विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा, 2020) |
| नॉमिनी | आमतौर पर मालिक नहीं बनता, कानूनी वारिसों के लिए रखता है |
| मुस्लिम, ईसाई, पारसी | मुस्लिम पर्सनल लॉ; भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 |
हिंदू पुरुष की बिना वसीयत मृत्यु: धारा 8
बिना वैध वसीयत के मरने वाले व्यक्ति को कानून की भाषा में “निर्वसीयत” (intestate) कहते हैं। हिंदू पुरुष के लिए धारा 8 यह क्रम तय करती है:
- वर्ग I के वारिस सबसे पहले लेते हैं। इनमें विधवा, बेटे, बेटियाँ और माँ शामिल हैं, और पूर्व-मृत बेटे के बच्चे और विधवा, तथा पूर्व-मृत बेटी के बच्चे भी, जैसा अनुसूची में लिखा है।
- वर्ग I में कोई न हो, तो वर्ग II के वारिस अनुसूची के क्रम में लेते हैं। पिता वर्ग II की पहली प्रविष्टि में हैं।
- वर्ग II में भी कोई न हो, तो पुरुष-पक्ष के रिश्तेदार (agnates), फिर अन्य रिश्तेदार (cognates)।
उदाहरण: लखनऊ के सुरेश जी का निधन बिना वसीयत के हुआ। उनके परिवार में पत्नी, एक बेटा, दो बेटियाँ और माँ हैं। उनकी स्व-अर्जित (self-acquired) संपत्ति पाँच बराबर हिस्सों में बँटेगी: हर एक को 1/5। उनके पिता जीवित होते, तब भी उन्हें कुछ नहीं मिलता, क्योंकि वर्ग I के वारिस मौजूद हैं।
शादीशुदा बेटी का हिस्सा भी उतना ही है जितना बेटे का। शादी से बेटी का अधिकार खत्म नहीं होता।
हिंदू महिला की बिना वसीयत मृत्यु: धारा 15 और 16
हिंदू महिला की संपत्ति के लिए धारा 15 अलग क्रम रखती है:
- पहले उसके बेटे और बेटियाँ (पूर्व-मृत बेटे या बेटी के बच्चों सहित) और पति;
- फिर पति के वारिस;
- फिर माता-पिता;
- फिर पिता के वारिस, और अंत में माँ के वारिस।
विशेष नियम (धारा 15(2)): अगर महिला की कोई संतान नहीं है, तो जो संपत्ति उसे अपने माता-पिता से मिली थी, वह उसके पिता के वारिसों के पास जाती है; और जो संपत्ति पति या ससुर से मिली थी, वह पति के वारिसों के पास जाती है। धारा 16 बताती है कि वारिस किस क्रम और तरीके से लेंगे।
इसे ठीक से सीखें, सर्टिफ़िकेट के साथ। एवरीडे लॉ (हिंदी) के संपत्ति मॉड्यूल में वसीयत, उत्तराधिकार, नॉमिनी बनाम वारिस, उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र और रजिस्ट्री-दाखिल खारिज आसान हिंदी में समझाए गए हैं। एवरीडे लॉ: हर भारतीय के लिए कानून (हिंदी), ₹299: अपनी रफ़्तार से पढ़ने वाले पाठ, हर मॉड्यूल पर क्विज़ और 30 प्रश्नों की अंतिम परीक्षा; 60% अंक लाने पर Lexfolio का ऑनलाइन सत्यापन योग्य सर्टिफ़िकेट।
पैतृक संपत्ति में बेटी का अधिकार: धारा 6
हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के बाद धारा 6 के तहत बेटी जन्म से ही मिताक्षरा संयुक्त परिवार की सहदायिक है। उसे बेटे के बराबर अधिकार और बराबर दायित्व मिलते हैं।
विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि बेटी का यह अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं है कि 9 सितंबर 2005 को उसके पिता जीवित थे या नहीं। अधिकार जन्म से है।
उदाहरण: कानपुर की प्रिया के पिता का निधन 2001 में हुआ। दादा की पैतृक ज़मीन का बँटवारा अब तक नहीं हुआ है। विनीता शर्मा के फ़ैसले के बाद प्रिया अपने भाई के बराबर सहदायिक हिस्से का दावा कर सकती है।
ध्यान रखें: स्व-अर्जित संपत्ति और पैतृक संपत्ति अलग हैं। स्व-अर्जित संपत्ति का मालिक वसीयत से उसे किसी को भी दे सकता है।
नॉमिनी बनाम कानूनी वारिस
बैंक खाते, FD, बीमा या शेयर में दर्ज नॉमिनी को रकम मिल जाती है, लेकिन आमतौर पर वह मालिक नहीं बनता। वह रकम कानूनी वारिसों के लिए रखता है। शक्ति येज़दानी बनाम जयानंद सालगांवकर (2023) में सुप्रीम कोर्ट ने शेयरों के मामले में कहा कि नॉमिनेशन से नॉमिनी उत्तराधिकारी नहीं बन जाता।
मतलब: अगर पिता ने बेटे को नॉमिनी बनाया, पर बिना वसीयत के मरे, तो रकम सभी वर्ग I वारिसों में बँटेगी। विस्तार के लिए देखें बैंक नॉमिनेशन बनाम कानूनी वारिस (अंग्रेज़ी)।
ज़रूरी दस्तावेज़
- मृत्यु प्रमाण-पत्र: नगर निगम या ग्राम पंचायत से।
- वारिस प्रमाण-पत्र (legal heir certificate) या पारिवारिक सदस्यता प्रमाण-पत्र: राज्य के राजस्व विभाग (तहसील) से। यह पेंशन, बिजली कनेक्शन, दाखिल खारिज जैसे कामों में काम आता है। उत्तर प्रदेश की प्रक्रिया के लिए देखें उत्तर प्रदेश में वारिस प्रमाण-पत्र (अंग्रेज़ी)।
- उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र (succession certificate): भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत सिविल कोर्ट से, मृतक के कर्ज़ों और प्रतिभूतियों (जैसे बैंक जमा, शेयर) की वसूली के लिए। देखें उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र की प्रक्रिया (अंग्रेज़ी)।
- दाखिल खारिज (mutation): ज़मीन या मकान के राजस्व रिकॉर्ड में वारिसों का नाम चढ़वाने के लिए।
आम गलतियाँ
- यह मान लेना कि शादीशुदा बेटी का हिस्सा नहीं होता। होता है, बराबर।
- नॉमिनी को ही मालिक मान लेना।
- भाइयों का आपस में मौखिक बँटवारा कर लेना और बहनों को शामिल न करना। बाद में मुकदमे का बड़ा कारण यही बनता है।
- पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति में फ़र्क न समझना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या पिता की संपत्ति में शादीशुदा बेटी का हिस्सा है?
हाँ। धारा 8 के तहत बेटी वर्ग I की वारिस है, शादी से फ़र्क नहीं पड़ता। पैतृक संपत्ति में वह धारा 6 के तहत सहदायिक भी है।
पति की मृत्यु पर पत्नी को कितना मिलता है?
पत्नी वर्ग I की वारिस है और बेटों, बेटियों और माँ के साथ बराबर हिस्सा लेती है।
क्या दादा-दादी या पिता का हिस्सा होता है?
पिता वर्ग II में हैं, तो वर्ग I का कोई वारिस हो तो पिता को नहीं मिलता। माँ वर्ग I में है।
नॉमिनी और वारिस में किसकी चलेगी?
नॉमिनी को रकम मिलती है, पर वह कानूनी वारिसों के लिए रखता है। मालिकाना हक़ उत्तराधिकार कानून से तय होता है।
क्या मुसलमानों पर भी यही कानून लागू है?
नहीं। मुसलमानों पर उनका पर्सनल लॉ लागू होता है; ईसाई और पारसी के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925।
छोटा क्विज़
Q1. हिंदू पुरुष की बिना वसीयत मृत्यु पर पिता किस वर्ग के वारिस हैं?
- वर्ग I
- वर्ग II
- सहदायिक
- वारिस नहीं
उत्तर देखें
उत्तर: B. पिता वर्ग II की पहली प्रविष्टि में हैं (धारा 8 और अनुसूची)।
Q2. विनीता शर्मा (2020) के अनुसार बेटी का सहदायिक अधिकार:
- तभी, जब पिता 9 सितंबर 2005 को जीवित हों
- जन्म से, पिता के जीवित होने की शर्त के बिना
- सिर्फ़ अविवाहित बेटी को
- सिर्फ़ स्व-अर्जित संपत्ति में
उत्तर देखें
उत्तर: B. धारा 6 के तहत अधिकार जन्म से है, पिता के जीवित होने पर निर्भर नहीं।
Q3. बैंक खाते का नॉमिनी:
- हमेशा मालिक बनता है
- आमतौर पर रकम कानूनी वारिसों के लिए रखता है
- सिर्फ़ गवाह होता है
- टैक्स भरता है
उत्तर देखें
उत्तर: B. नॉमिनेशन से मालिकाना हक़ नहीं मिलता (शक्ति येज़दानी, 2023)।
उत्तराधिकार और संपत्ति कानून आसान हिंदी में सीखें: एवरीडे लॉ (हिंदी), ₹299।
यही गाइड अंग्रेज़ी में पढ़ें: बिना वसीयत संपत्ति किसे मिलती है (अंग्रेज़ी संस्करण)।
स्रोत
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956, धारा 6, 8, 15, 16 और अनुसूची
- हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005
- भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र)
- विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा, सुप्रीम कोर्ट, 2020
- शक्ति येज़दानी बनाम जयानंद जयंत सालगांवकर, सुप्रीम कोर्ट, 2023
यह पेज शिक्षा और सामान्य जानकारी के लिए है, किसी विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं। कानून 29 अक्टूबर 2026 की स्थिति के अनुसार।
Useful books for this topic
- Bare acts of the new criminal laws (BNS, BNSS, BSA)
- Code of Civil Procedure bare act
- Legal drafting and conveyancing books
- Constitution of India (coat pocket edition)
As an Amazon Associate, Lexfolio earns from qualifying purchases. Prices and availability are shown on Amazon.
Leave a Reply