भारतीय संविधान पर आधारित संवैधानिक विधि नोट्स, LLB प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों के लिए हिंदी में।
उद्देशिका और मूल ढांचा
उद्देशिका भारत को “संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य” घोषित करती है (“समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़े गए)। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में मूल ढांचा सिद्धांत स्थापित हुआ: अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद की संविधान संशोधन शक्ति संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदल सकती।
मौलिक अधिकार (भाग III)
अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता), अनुच्छेद 19(1)(a)-(g) (छह स्वतंत्रताएं), अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण, मेनका गांधी मामले के बाद व्यापक रूप से व्याख्यायित, जिसमें गरिमा से जीने का अधिकार और निजता का अधिकार पुट्टास्वामी, 2017 शामिल है), और अनुच्छेद 25-28 (धर्म की स्वतंत्रता) मुख्य परीक्षा विषय हैं।
नीति निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य
अनुच्छेद 37 नीति निदेशक तत्वों को न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं बनाता लेकिन “देश के शासन में मूलभूत” मानता है। अनुच्छेद 51A में 42वें संशोधन (1976) द्वारा जोड़े गए ग्यारह मौलिक कर्तव्य सूचीबद्ध हैं।
रिट क्षेत्राधिकार
अनुच्छेद 32 (उच्चतम न्यायालय) और अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) पांच रिट जारी करने की शक्ति देते हैं — बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, और अधिकार-पृच्छा — मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए (और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत “किसी अन्य प्रयोजन” के लिए भी, जिससे उच्च न्यायालयों का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय से व्यापक हो जाता है)।
परीक्षा के लिए मुख्य प्रश्न
- केशवानंद भारती मामले के संदर्भ में मूल ढांचा सिद्धांत समझाइए।
- मेनका गांधी और पुट्टास्वामी के बाद अनुच्छेद 21 का विस्तार।
- अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के रिट क्षेत्राधिकार में अंतर।
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