1 जुलाई 2024 से एफआईआर (FIR, प्रथम सूचना रिपोर्ट) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 के तहत दर्ज होती है, जिसने पुरानी CrPC की धारा 154 की जगह ली है। आप किसी भी थाने में मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सूचना दे सकते हैं, चाहे अपराध कहीं भी हुआ हो (ज़ीरो एफआईआर)। ई-एफआईआर पर तीन दिन के भीतर हस्ताक्षर करना ज़रूरी है, और एफआईआर की प्रति आपको मुफ़्त मिलती है। पुलिस मना करे तो पहले पुलिस अधीक्षक (SP) और फिर मजिस्ट्रेट के पास जाने का रास्ता है।
| बिंदु | स्थिति |
|---|---|
| कानून | BNSS 2023 की धारा 173 (पुरानी CrPC धारा 154) |
| कहाँ दर्ज कराएँ | किसी भी थाने में, अपराध का स्थान चाहे जो हो (ज़ीरो एफआईआर) |
| तरीका | मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक (ई-एफआईआर) |
| ई-एफआईआर पर हस्ताक्षर | सूचना देने वाले को तीन दिन के भीतर हस्ताक्षर करने होंगे |
| एफआईआर की प्रति | सूचना देने वाले या पीड़ित को मुफ़्त, धारा 173(2) |
| प्रारंभिक जाँच (Preliminary Enquiry) | 3 साल या अधिक पर 7 साल से कम सज़ा वाले अपराध, DSP की अनुमति से, 14 दिन में, धारा 173(3) |
| पुलिस मना करे | SP को लिखित शिकायत, धारा 173(4); फिर मजिस्ट्रेट, धारा 175(3), शपथ पत्र के साथ |
| मुख्य फ़ैसला | ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013): संज्ञेय अपराध हो तो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य |
एफआईआर क्या है और पुलिस कब दर्ज करने को बाध्य है
एफआईआर किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) की पहली लिखित सूचना है। संज्ञेय अपराध वह है जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है और मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जाँच शुरू कर सकती है, जैसे चोरी, लूट, धोखाधड़ी, बलात्कार, दहेज मृत्यु। कौन सा अपराध संज्ञेय है, यह BNSS की पहली अनुसूची (First Schedule) में दिया है।
ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि अगर सूचना से संज्ञेय अपराध बनता है, तो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। थाने का मुंशी यह नहीं कह सकता कि “पहले सबूत लाओ” या “आपस में समझौता कर लो”। शिकायत सच है या नहीं, यह जाँच में तय होगा।
ज़ीरो एफआईआर और ई-एफआईआर
ज़ीरो एफआईआर (Zero FIR): धारा 173(1) के अनुसार सूचना “अपराध के स्थान की परवाह किए बिना” दी जा सकती है। मान लीजिए लखनऊ के हज़रतगंज में प्रिया का पर्स छीना गया, पर वह पहले गोमती नगर थाने पहुँची। गोमती नगर पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी होगी और फिर उसे जाँच के लिए संबंधित थाने को भेजना होगा। “यह हमारा इलाका नहीं है” अब कोई बहाना नहीं है।
ई-एफआईआर (e-FIR): सूचना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी दी जा सकती है। धारा 173(1)(ii) के अनुसार ई-एफआईआर तभी रिकॉर्ड पर ली जाती है जब सूचना देने वाला तीन दिन के भीतर उस पर हस्ताक्षर कर दे। कई राज्यों की पुलिस वेबसाइट और ऐप पर ऑनलाइन शिकायत होती है। ऑनलाइन शिकायत के बाद रेफ़रेंस नंबर नोट करें और तीन दिन में थाने जाकर हस्ताक्षर करें।
थाने में एफआईआर दर्ज कराने के चरण
- नज़दीकी थाने जाएँ। क्षेत्राधिकार (jurisdiction) के नाम पर आपको लौटाया नहीं जा सकता।
- लिखित शिकायत दें। खुद हस्ताक्षर की हुई लिखित शिकायत सबसे अच्छी है। उसकी दो प्रतियाँ रखें।
- मौखिक सूचना हो तो अधिकारी उसे लिखेगा और आपको पढ़कर सुनाएगा। हस्ताक्षर से पहले ध्यान से जाँचें।
- क्या लिखें: आपका नाम, पता, फ़ोन; क्या हुआ, कब और कहाँ; आरोपी का नाम या हुलिया; नुकसान या चोट; गवाहों के नाम; आपके पास मौजूद सबूत; देरी हुई हो तो उसका कारण।
- मुफ़्त प्रति लें (धारा 173(2))। एफआईआर नंबर, तारीख, थाना और लगाई गई धाराएँ नोट करें।
असंज्ञेय अपराध (non-cognizable offence): छोटे अपराधों में पुलिस सूचना को रजिस्टर में दर्ज करती है (आम बोलचाल में NCR) और आपको मजिस्ट्रेट के पास भेजती है। मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना पुलिस ऐसे मामले की जाँच नहीं कर सकती।
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पुलिस एफआईआर दर्ज करने से मना करे तो क्या करें
- लिखित शिकायत की पावती लें। थाने में दी गई शिकायत की दूसरी प्रति पर मुहर या हस्ताक्षर लें। मना करें तो समय, तारीख और अधिकारी का नाम नोट करें।
- डाक और ईमेल से भेजें। वही शिकायत रजिस्टर्ड या स्पीड पोस्ट से थानाध्यक्ष (SHO) को भेजें और रसीद संभालें।
- पुलिस अधीक्षक (SP) को लिखें, धारा 173(4)। शिकायत का सार लिखकर डाक से SP को भेजें। SP संतुष्ट हों कि संज्ञेय अपराध बनता है, तो वे खुद जाँच करेंगे या किसी अधीनस्थ अधिकारी को जाँच का निर्देश देंगे।
- राज्य पुलिस पोर्टल पर भी शिकायत करें और पावती नंबर सुरक्षित रखें।
- मजिस्ट्रेट के पास आवेदन, धारा 175(3)। SP के पास जाने के बाद भी कार्रवाई न हो, तो न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास आवेदन करें। धारा 175(3) के अनुसार आवेदन से पहले SP के पास धारा 173(4) के तहत जाना ज़रूरी है और आवेदन के साथ शपथ पत्र (affidavit) लगाना होता है।
हर कदम का सबूत रखें: डाक रसीदें, ट्रैकिंग, ईमेल, पोर्टल की पावती और तारीख़ों की सूची। मजिस्ट्रेट के सामने आपका मामला कागज़ों से ही मज़बूत बनेगा।
एफआईआर के बाद आपके अधिकार
- एफआईआर की मुफ़्त प्रति पाने का अधिकार।
- गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी का कारण जानने (धारा 47), परिवार को सूचना (धारा 48), पूछताछ के दौरान वकील से मिलने (धारा 38) और 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने (धारा 58; अनुच्छेद 22(2)) का अधिकार।
- हिरासत में व्यक्ति को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के तहत मुफ़्त कानूनी सहायता। NALSA हेल्पलाइन 15100।
- आपात स्थिति में 112, महिला हेल्पलाइन 181, साइबर धोखाधड़ी के लिए 1930।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या पुलिस यह कहकर मना कर सकती है कि घटना दूसरे इलाके की है?
नहीं। धारा 173(1) BNSS के तहत ज़ीरो एफआईआर दर्ज करनी होगी और फिर उसे संबंधित थाने को भेजा जाएगा।
क्या एफआईआर की कॉपी के पैसे लगते हैं?
नहीं। धारा 173(2) BNSS के तहत सूचना देने वाले या पीड़ित को प्रति मुफ़्त दी जाती है।
ई-एफआईआर पर कितने दिन में हस्ताक्षर करने होंगे?
तीन दिन के भीतर। उसके बाद ही वह रिकॉर्ड पर ली जाती है।
क्या मैं सीधे मजिस्ट्रेट के पास जा सकता हूँ?
धारा 175(3) BNSS के तहत आवेदन से पहले धारा 173(4) में SP के पास जाना ज़रूरी है, और आवेदन के साथ शपथ पत्र लगता है।
पुलिस पहले जाँच की बात कहे तो?
प्रारंभिक जाँच केवल 3 साल या अधिक पर 7 साल से कम सज़ा वाले अपराधों में, DSP की अनुमति से, 14 दिन में हो सकती है। 7 साल या अधिक सज़ा वाले अपराध में एफआईआर तुरंत दर्ज होनी चाहिए।
त्वरित प्रश्नोत्तरी
प्र1. BNSS की कौन सी धारा एफआईआर दर्ज करने से जुड़ी है?
- धारा 154
- धारा 173
- धारा 175
- धारा 35
उत्तर देखें
उत्तर: B. धारा 173 BNSS ने CrPC की धारा 154 की जगह ली है।
प्र2. थाना एफआईआर न लिखे तो धारा 173(4) के तहत लिखित शिकायत किसे भेजी जाती है?
- ज़िलाधिकारी
- पुलिस अधीक्षक (SP)
- हाई कोर्ट
- ग्राम प्रधान
उत्तर देखें
उत्तर: B. धारा 173(4) BNSS के तहत पुलिस अधीक्षक को।
प्र3. ई-एफआईआर पर हस्ताक्षर की समय सीमा क्या है?
- 24 घंटे
- 3 दिन
- 7 दिन
- 14 दिन
उत्तर देखें
उत्तर: B. धारा 173(1)(ii) BNSS के तहत तीन दिन।
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स्रोत
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023: धारा 173, 175(3), 38, 47, 48, 58, पहली अनुसूची
- भारत का संविधान: अनुच्छेद 22
- ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार, सुप्रीम कोर्ट (संविधान पीठ), 2013
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987: धारा 12
यह पृष्ठ शिक्षा और सामान्य जानकारी के लिए है, किसी विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं। कानून 29 अक्टूबर 2026 की स्थिति के अनुसार।
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