IPC की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करने के आशय से हमला या आपराधिक बल) अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 74 है। सज़ा पहले जैसी है: कम से कम एक वर्ष, जो पाँच वर्ष तक बढ़ सकता है, और जुर्माना। अपराध संज्ञेय और अजमानती है और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पुरानी धारा | IPC धारा 354 |
| नई धारा | BNS धारा 74 |
| अपराध | लज्जा भंग करने के आशय से महिला पर हमला या आपराधिक बल |
| सज़ा | न्यूनतम 1 वर्ष, अधिकतम 5 वर्ष, किसी भी भाँति का कारावास, और जुर्माना |
| संज्ञेय (Cognizable) | हाँ |
| जमानती (Bailable) | नहीं |
| शमनीय (Compoundable) | नहीं |
| विचारण न्यायालय | कोई भी मजिस्ट्रेट |
धारा 74 के तत्व
धारा 74 के अंतर्गत अपराध के लिए तीन बातें सिद्ध होनी चाहिए:
- पीड़ित महिला हो। कानून में उम्र की कोई सीमा नहीं है, बच्ची भी इसमें आती है।
- अभियुक्त ने उस पर हमला (assault) किया या आपराधिक बल (criminal force) का प्रयोग किया। हमले और आपराधिक बल की परिभाषाएँ BNS धारा 128 से 130 में हैं।
- ऐसा उसकी लज्जा (modesty) भंग करने के आशय से किया, या यह जानते हुए कि इससे उसकी लज्जा भंग होने की संभावना है।
सबसे महत्वपूर्ण तत्व आशय या ज्ञान है। केवल धक्का लग जाना पर्याप्त नहीं, पर यदि कृत्य से साफ़ यौन अर्थ झलकता हो तो आशय परिस्थितियों से निकाला जा सकता है।
पुराने कानून से क्या बदला
धारा 74 में अपराध की भाषा और सज़ा लगभग IPC 354 जैसी ही है। वास्तविक बदलाव संरचना में है। महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराधों को अब BNS के अध्याय 5 (महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराध) में एक साथ रखा गया है। संबंधित धाराओं का नया क्रम:
- IPC 354 (लज्जा भंग) = BNS 74
- IPC 354A (यौन उत्पीड़न) = BNS 75
- IPC 354B (निर्वस्त्र करने के आशय से हमला) = BNS 76
- IPC 354C (दृश्यरतिकता, voyeurism) = BNS 77
- IPC 354D (पीछा करना, stalking) = BNS 78
- IPC 509 (शब्द, इशारे से लज्जा का अपमान) = BNS 79
IPC 509 को महिलाओं से जुड़े अध्याय में लाना भी एक व्यवस्थागत बदलाव है। BNS 79 BNSS धारा 359 के अंतर्गत केवल अदालत की अनुमति से शमनीय है, जबकि BNS 74 बिल्कुल शमनीय नहीं है।
महत्वपूर्ण केस लॉ
- पंजाब राज्य बनाम मेजर सिंह (AIR 1967 SC 63): साढ़े सात महीने की बच्ची से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लज्जा का आधार स्त्री होना है, उम्र नहीं। जो कृत्य सामान्य मानवीय समझ में स्पष्ट रूप से यौन अर्थ वाला हो, वह इस धारा में आता है।
- रूपन देओल बजाज बनाम के.पी.एस. गिल (1995): एक वरिष्ठ IAS अधिकारी के साथ सार्वजनिक समारोह में हुए दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोप प्रथम दृष्टया धारा 354 का अपराध बनाते हैं और FIR रद्द करने से इनकार किया। अदालत ने मेजर सिंह की व्याख्या अपनाई।
- राजू पांडुरंग महाले बनाम महाराष्ट्र राज्य (2004): कसौटी यह है कि क्या कृत्य किसी महिला की शालीनता की भावना को आघात पहुँचाने में सक्षम माना जा सकता है।
आम भ्रम
धारा 74 और धारा 79 में अंतर
धारा 74 में शारीरिक हमला या बल का प्रयोग होता है। धारा 79 में कोई शारीरिक संपर्क नहीं होता, बल्कि शब्द, ध्वनि, इशारा या वस्तु दिखाकर अपमान किया जाता है। धारा 79 की सज़ा कम है।
धारा 74 और धारा 75 में अंतर
धारा 75 (यौन उत्पीड़न) में अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन अनुग्रह की मांग, अश्लील सामग्री दिखाना या यौन टिप्पणी जैसी विशेष स्थितियाँ गिनाई गई हैं। धारा 74 का दायरा सामान्य है और उसमें न्यूनतम सज़ा एक वर्ष अनिवार्य है।
नाबालिग पीड़िता
18 वर्ष से कम आयु की पीड़िता होने पर पॉक्सो अधिनियम, 2012 के प्रावधान भी लगते हैं, जो प्रायः अधिक कठोर हैं।
आम लोगों के लिए व्यावहारिक जानकारी
- पीड़िता किसी भी थाने में FIR दर्ज करा सकती है। घटना किसी अन्य थाना क्षेत्र की हो तो भी “ज़ीरो FIR” दर्ज होती है और बाद में संबंधित थाने को भेजी जाती है।
- महिलाओं के विरुद्ध कुछ अपराधों में, जिनमें धारा 74 शामिल है, पीड़िता की सूचना महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा दर्ज किए जाने की व्यवस्था BNSS धारा 173 में है।
- मेडिकल जांच, घटनास्थल की तस्वीरें, CCTV फुटेज और गवाहों के नाम जल्द सुरक्षित करें। आपात स्थिति में 112 और महिला हेल्पलाइन 181 पर संपर्क किया जा सकता है।
- अभियुक्त पक्ष के लिए: अपराध अजमानती है, इसलिए जमानत मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय के विवेक पर है। गिरफ्तारी की आशंका में BNSS धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत मांगी जा सकती है।
परीक्षा की दृष्टि से (Exam angle)
- IPC 354 = BNS 74, 354A = 75, 354B = 76, 354C = 77, 354D = 78, 509 = 79। यह पूरी श्रृंखला एक साथ याद करें।
- सज़ा: न्यूनतम 1 वर्ष, अधिकतम 5 वर्ष, और जुर्माना।
- मेजर सिंह (1967): लज्जा का आधार स्त्री होना है, उम्र नहीं।
- वर्गीकरण: संज्ञेय, अजमानती, अशमनीय, कोई भी मजिस्ट्रेट।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently asked questions)
धारा 354 नई धारा क्या है?
IPC की धारा 354 अब BNS की धारा 74 है। सज़ा एक से पाँच वर्ष तक का कारावास और जुर्माना है।
क्या धारा 74 में जमानत मिलती है?
यह अजमानती अपराध है। जमानत अधिकार नहीं, अदालत का विवेक है, जो आरोपों की प्रकृति और साक्ष्य देखकर दी जाती है।
क्या धारा 74 में समझौता हो सकता है?
नहीं, यह BNSS धारा 359 की शमनीय सूची में नहीं है। केवल असाधारण मामलों में उच्च न्यायालय BNSS धारा 528 के तहत कार्यवाही रद्द करने पर विचार कर सकता है।
354A, 354B, 354C, 354D अब कौन सी धाराएँ हैं?
क्रमशः BNS धारा 75, 76, 77 और 78।
छेड़छाड़ की शिकायत कहाँ करें?
नज़दीकी थाने में FIR दर्ज कराएँ। आपात स्थिति में 112 पर कॉल करें।
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क्विक क्विज़ (Quick quiz)
Q1. IPC धारा 354 का BNS में समकक्ष क्या है?
- धारा 75
- धारा 79
- धारा 64
- धारा 74
उत्तर देखें
उत्तर: D. लज्जा भंग का अपराध अब BNS धारा 74 में है।
Q2. BNS धारा 74 में न्यूनतम सज़ा कितनी है?
- एक वर्ष
- छह महीने
- तीन वर्ष
- कोई न्यूनतम नहीं
उत्तर देखें
उत्तर: A. न्यूनतम एक वर्ष और अधिकतम पाँच वर्ष, साथ में जुर्माना।
Q3. IPC 354D (पीछा करना) अब BNS की किस धारा में है?
- धारा 76
- धारा 77
- धारा 78
- धारा 79
उत्तर देखें
उत्तर: C. Stalking अब BNS धारा 78 में है। धारा 77 voyeurism से संबंधित है।
Q4. “लज्जा का आधार स्त्री होना है, उम्र नहीं”, यह सिद्धांत किस केस से है?
- रूपन देओल बजाज बनाम के.पी.एस. गिल
- पंजाब राज्य बनाम मेजर सिंह
- विशाखा बनाम राजस्थान राज्य
- राजू पांडुरंग महाले बनाम महाराष्ट्र राज्य
उत्तर देखें
उत्तर: B. मेजर सिंह (AIR 1967 SC 63) में एक शिशु बच्ची के मामले में यह सिद्धांत दिया गया।
Q5. BNS धारा 74 के अपराध के बारे में कौन सा कथन सही है?
- असंज्ञेय और जमानती
- केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय
- अदालत की अनुमति से शमनीय
- संज्ञेय, अजमानती और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
उत्तर देखें
उत्तर: D. BNSS प्रथम अनुसूची में धारा 74 संज्ञेय, अजमानती और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
स्रोत (Sources)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023, धारा 74 से 79 (India Code)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, प्रथम अनुसूची और धारा 359
- पंजाब राज्य बनाम मेजर सिंह, AIR 1967 SC 63
- रूपन देओल बजाज बनाम के.पी.एस. गिल, सुप्रीम कोर्ट, 1995
यह पृष्ठ शिक्षा और सामान्य जानकारी के लिए है, किसी विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं।
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