IPC की धारा 307 (हत्या का प्रयास) अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 109 है। सामान्य सज़ा दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना है, और यदि किसी को चोट (hurt) पहुँची हो तो आजीवन कारावास तक। अपराध संज्ञेय, अजमानती और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पुरानी धारा | IPC धारा 307 |
| नई धारा | BNS धारा 109(1) और 109(2) |
| अपराध | हत्या का प्रयास (Attempt to murder) |
| सज़ा, चोट न होने पर | किसी भी भाँति का कारावास 10 वर्ष तक, और जुर्माना |
| सज़ा, चोट होने पर | आजीवन कारावास, या 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना |
| आजीवन सिद्धदोष द्वारा प्रयास, चोट होने पर | मृत्युदंड, या शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास |
| संज्ञेय (Cognizable) | हाँ |
| जमानती (Bailable) | नहीं |
| शमनीय (Compoundable) | नहीं |
| विचारण न्यायालय | सत्र न्यायालय |
धारा 109 का सार
धारा 109(1) उस व्यक्ति को दंडित करती है जो कोई कार्य ऐसे आशय (intention) या ज्ञान (knowledge) से, और ऐसी परिस्थितियों में करता है कि यदि उस कार्य से मृत्यु हो जाती तो वह हत्या का दोषी होता। सीधी भाषा में, कार्य वही है जो हत्या बन सकता था, बस परिणाम यानी मृत्यु नहीं हुई।
इसके तीन तत्व हैं:
- अभियुक्त ने कोई कार्य किया।
- वह कार्य हत्या के लिए आवश्यक आशय या ज्ञान के साथ किया गया।
- परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि मृत्यु होने पर अपराध हत्या ही होता, किसी अपवाद में नहीं जाता।
चोट पहुँचना अपराध का तत्व नहीं है। चोट केवल सज़ा बढ़ाने का आधार है। धारा के दृष्टांत भी यही दिखाते हैं: मारने के आशय से गोली चलाना और निशाना चूक जाना भी इस धारा का अपराध है।
पुराने कानून से क्या बदला
अपराध की परिभाषा और सामान्य सज़ा में कोई बदलाव नहीं है। IPC 307 का पहला भाग BNS 109(1) बन गया है और दूसरा भाग, जो आजीवन कारावास भुगत रहे व्यक्ति से संबंधित था, अब अलग उपधारा 109(2) है।
बदलाव 109(2) की सज़ा में है। IPC 307 के दूसरे भाग में आजीवन सिद्धदोष (life convict) द्वारा प्रयास में चोट होने पर केवल मृत्युदंड “may be punished with death” का उल्लेख था। BNS 109(2) में मृत्युदंड के साथ आजीवन कारावास का विकल्प भी जोड़ा गया है और स्पष्ट लिखा है कि इसका अर्थ “remainder of that person’s natural life” होगा। इससे अदालत के पास अब दो विकल्प हैं।
वर्गीकरण भी पहले जैसा है: संज्ञेय, अजमानती, अशमनीय और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय।
महत्वपूर्ण केस लॉ
- ओम प्रकाश बनाम पंजाब राज्य (AIR 1961 SC 1782): पत्नी को लंबे समय तक भोजन न देकर भूखा रखना हत्या का प्रयास माना गया। प्रयास के लिए यह ज़रूरी नहीं कि अंतिम कार्य ही किया गया हो, अपराध की दिशा में किया गया कोई भी कार्य पर्याप्त हो सकता है।
- महाराष्ट्र राज्य बनाम बलराम बामा पाटिल ((1983) 2 SCC 28): दोषसिद्धि के लिए यह आवश्यक नहीं कि मृत्यु कारित करने योग्य चोट पहुँची हो। निर्णायक बात अभियुक्त का आशय और ज्ञान है।
- मध्य प्रदेश राज्य बनाम सलीम ((2005) 5 SCC 554): चोट मामूली हो तब भी, यदि आशय हत्या का था तो अपराध बनता है। चोट की प्रकृति आशय का एक संकेत है, एकमात्र कसौटी नहीं।
- नरिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य ((2014) 6 SCC 466): धारा 307 का अपराध अशमनीय है, फिर भी उच्च न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्ति से वास्तविक समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द कर सकता है, पर बहुत सावधानी से। चोट की प्रकृति, हथियार और शरीर के नाज़ुक अंग पर वार जैसे तथ्य देखे जाते हैं। यह शक्ति अब BNSS धारा 528 में है।
आम भ्रम
गंभीर चोट (grievous hurt) और हत्या के प्रयास में अंतर
गंभीर चोट के अपराध में आशय चोट पहुँचाने का होता है, जान लेने का नहीं। हत्या के प्रयास में आशय या ज्ञान मृत्यु से जुड़ा होता है। इसलिए गहरी चोट होना अपने आप धारा 109 नहीं बनाता, और हल्की चोट होने से धारा 109 खत्म नहीं होती।
क्या चोट न लगने पर भी धारा 109 लगती है
हाँ। चोट न होने पर भी सज़ा 10 वर्ष तक हो सकती है। चोट होने पर सज़ा आजीवन कारावास तक बढ़ सकती है।
तैयारी और प्रयास
केवल हथियार खरीदना आमतौर पर तैयारी है। जब अभियुक्त तैयारी से आगे बढ़कर अपराध की ओर ठोस कदम उठाता है, जैसे निशाना साधकर गोली चलाना, तब प्रयास शुरू होता है।
आम लोगों के लिए व्यावहारिक जानकारी
- पीड़ित पक्ष तुरंत थाने में FIR दर्ज कराए। घायल व्यक्ति की मेडिको लीगल रिपोर्ट (MLR) सरकारी अस्पताल से बनवाना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि चोट का विवरण आगे सज़ा तय करने में काम आता है।
- हथियार, कपड़े, फ़ोटो, CCTV फुटेज और गवाहों की जानकारी सुरक्षित रखें।
- अभियुक्त पक्ष के लिए: नियमित जमानत सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय से मांगी जाती है। गिरफ्तारी की आशंका हो तो BNSS धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत का आवेदन किया जा सकता है।
- थाने में समझौता लिख देने से केस खत्म नहीं होता। वास्तविक समझौते पर केवल उच्च न्यायालय BNSS धारा 528 में कार्यवाही रद्द करने पर विचार कर सकता है।
परीक्षा की दृष्टि से (Exam angle)
- IPC 307 = BNS 109। IPC 308 (आपराधिक मानव वध का प्रयास) = BNS 110।
- 109(2) में नया: मृत्युदंड के साथ आजीवन कारावास का विकल्प, जिसका अर्थ शेष प्राकृतिक जीवन।
- चोट अपराध का तत्व नहीं, केवल सज़ा बढ़ाने का आधार है। यह कथन आधारित प्रश्नों में अक्सर आता है।
- ओम प्रकाश (1961) प्रयास की व्यापक व्याख्या के लिए और नरिंदर सिंह (2014) समझौते पर quashing के लिए याद रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently asked questions)
धारा 307 नई धारा क्या है?
IPC की धारा 307 अब BNS की धारा 109 है। आजीवन कारावास भुगत रहे व्यक्ति वाला भाग अब धारा 109(2) में है।
धारा 109 BNS में कितनी सज़ा है?
चोट न होने पर 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना। चोट होने पर आजीवन कारावास या 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना।
क्या धारा 109 में जमानत मिलती है?
यह अजमानती अपराध है, इसलिए जमानत अदालत के विवेक पर है। चोट की प्रकृति, अभियुक्त की भूमिका, आपराधिक इतिहास और जांच की स्थिति देखकर निर्णय होता है।
क्या धारा 307 या 109 में समझौता हो सकता है?
अपराध शमनीय नहीं है। वास्तविक समझौते पर उच्च न्यायालय BNSS धारा 528 के तहत असाधारण मामलों में कार्यवाही रद्द कर सकता है।
धारा 109 किस कोर्ट में चलती है?
BNSS की प्रथम अनुसूची के अनुसार यह सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
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क्विक क्विज़ (Quick quiz)
Q1. IPC धारा 307 का BNS में समकक्ष क्या है?
- धारा 103
- धारा 110
- धारा 109
- धारा 115
उत्तर देखें
उत्तर: C. हत्या का प्रयास अब BNS धारा 109 में है। धारा 110 आपराधिक मानव वध के प्रयास से संबंधित है।
Q2. धारा 109(1) में चोट न होने पर अधिकतम सज़ा क्या है?
- 10 वर्ष तक कारावास और जुर्माना
- 7 वर्ष तक कारावास
- आजीवन कारावास
- मृत्युदंड
उत्तर देखें
उत्तर: A. चोट न होने पर 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना। चोट होने पर आजीवन कारावास तक संभव है।
Q3. धारा 109(2) में BNS ने क्या नया जोड़ा?
- न्यूनतम सात वर्ष की सज़ा
- सामुदायिक सेवा
- अपराध को जमानती बनाया
- मृत्युदंड के साथ शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास का विकल्प
उत्तर देखें
उत्तर: D. IPC में आजीवन सिद्धदोष के लिए केवल मृत्युदंड का उल्लेख था। BNS ने आजीवन कारावास का विकल्प जोड़ा।
Q4. पत्नी को भूखा रखना हत्या का प्रयास माना गया, यह किस केस में हुआ?
- नरिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य
- ओम प्रकाश बनाम पंजाब राज्य
- विरसा सिंह बनाम पंजाब राज्य
- मध्य प्रदेश राज्य बनाम सलीम
उत्तर देखें
उत्तर: B. ओम प्रकाश (AIR 1961 SC 1782) में लंबे समय तक भूखा रखने को हत्या का प्रयास माना गया।
Q5. धारा 109 के अपराध के लिए कौन सा कथन सही है?
- चोट पहुँचना अनिवार्य तत्व है
- यह प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है
- आशय या ज्ञान निर्णायक है, चोट केवल सज़ा बढ़ाती है
- यह शमनीय अपराध है
उत्तर देखें
उत्तर: C. बलराम बामा पाटिल और सलीम के मामलों में कहा गया कि आशय और ज्ञान मुख्य हैं, चोट की प्रकृति निर्णायक नहीं।
स्रोत (Sources)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023, धारा 109 (India Code)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, प्रथम अनुसूची और धारा 359
- ओम प्रकाश बनाम पंजाब राज्य, AIR 1961 SC 1782
- नरिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य, (2014) 6 SCC 466
यह पृष्ठ शिक्षा और सामान्य जानकारी के लिए है, किसी विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं।
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