भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 103 है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू है। हत्या की सज़ा पहले जैसी है: मृत्युदंड या आजीवन कारावास, और साथ में जुर्माना। नया बदलाव धारा 103(2) है, जिसमें पहली बार मॉब लिंचिंग को अलग से दंडनीय बनाया गया है।
कोई भी धारा खोजें: पुरानी या नई धारा संख्या डालकर तुरंत उसका समकक्ष देखें, IPC से BNS कन्वर्टर में।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पुरानी धारा | IPC धारा 302 |
| नई धारा | BNS धारा 103(1) (हत्या), 103(2) (पाँच या अधिक लोगों द्वारा पहचान आधारित हत्या) |
| हत्या की परिभाषा | BNS धारा 101 (पहले IPC धारा 300) |
| सज़ा | मृत्युदंड या आजीवन कारावास, और जुर्माना |
| संज्ञेय (Cognizable) | हाँ |
| जमानती (Bailable) | नहीं, अजमानती |
| शमनीय (Compoundable) | नहीं |
| विचारण न्यायालय (Triable by) | सत्र न्यायालय (Court of Session) |
धारा 103 क्या कहती है
धारा 103 स्वयं हत्या की परिभाषा नहीं देती, वह केवल सज़ा तय करती है। हत्या क्या है, यह धारा 101 बताती है। पहले आपराधिक मानव वध (culpable homicide) की परिभाषा धारा 100 में है, और जब वह धारा 101 की चार स्थितियों में से किसी में आता है और कोई अपवाद लागू नहीं होता, तब वह हत्या बनता है।
संक्षेप में, कार्य मृत्यु कारित करने के आशय (intention) से किया गया हो, या ऐसी शारीरिक क्षति पहुँचाने के आशय से जो अभियुक्त जानता था कि उस व्यक्ति की मृत्यु कारित कर सकती है, या ऐसी क्षति जो सामान्य प्रकृति में मृत्यु के लिए पर्याप्त हो, या ऐसा अत्यंत खतरनाक कार्य जिसके बारे में ज्ञान हो कि उससे मृत्यु लगभग निश्चित है। इन स्थितियों में अपराध हत्या है।
धारा 103(1) के अनुसार हत्या करने वाला “death or imprisonment for life” से दंडित होगा और जुर्माने का भी दायी होगा। यानी न्यूनतम सज़ा आजीवन कारावास है, इससे कम सज़ा अदालत नहीं दे सकती।
पुराने कानून से क्या बदला
1. मॉब लिंचिंग: धारा 103(2)
यह सबसे बड़ा बदलाव है। जब पाँच या अधिक व्यक्ति मिलकर (acting in concert) मूलवंश, जाति या समुदाय, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या “any other similar ground” के आधार पर हत्या करते हैं, तो समूह का हर सदस्य मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडित होगा और जुर्माने का भी दायी होगा। IPC में ऐसा कोई अलग प्रावधान नहीं था, ऐसे मामले सामान्य हत्या और सामान्य आशय (धारा 34) या विधिविरुद्ध जमाव (धारा 149) के सहारे चलाए जाते थे।
ध्यान दें कि आधिकारिक पाठ में “similar ground” शब्द है। एक निजी प्रकाशक के बेयर एक्ट में “similar” शब्द छूट गया था, जिस पर झारखंड उच्च न्यायालय ने जुलाई 2024 में स्वतः संज्ञान लेकर सुधार का निर्देश दिया। परीक्षा और अदालत, दोनों में आधिकारिक गज़ट पाठ ही मान्य है।
2. धाराओं का नया क्रम
IPC 299 (आपराधिक मानव वध) अब BNS 100 है, IPC 300 (हत्या) अब BNS 101, IPC 302 अब BNS 103, IPC 303 (आजीवन सिद्धदोष द्वारा हत्या) अब BNS 104 और IPC 304 अब BNS 105 है।
3. सज़ा में कोई बदलाव नहीं
सामान्य हत्या की सज़ा वही है। जमानत, संज्ञेयता और विचारण न्यायालय का वर्गीकरण भी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की प्रथम अनुसूची में पहले जैसा ही रखा गया है।
महत्वपूर्ण केस लॉ
- विरसा सिंह बनाम पंजाब राज्य (AIR 1958 SC 465): “सामान्य प्रकृति में मृत्यु के लिए पर्याप्त क्षति” वाली स्थिति के लिए परीक्षण दिया। प्रश्न यह है कि क्या अभियुक्त का आशय वही क्षति पहुँचाने का था जो वास्तव में पहुँची।
- आंध्र प्रदेश राज्य बनाम रायवरपु पुन्नैया ((1976) 4 SCC 382): आपराधिक मानव वध “genus” है और हत्या उसकी “species”। हर हत्या आपराधिक मानव वध है, पर हर आपराधिक मानव वध हत्या नहीं।
- बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य ((1980) 2 SCC 684): मृत्युदंड केवल “rarest of rare” मामलों में, और आजीवन कारावास नियम है, मृत्युदंड अपवाद।
- मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य ((1983) 3 SCC 470): बचन सिंह के सिद्धांत को लागू करने के लिए गुरुतर और शमनकारी परिस्थितियों की तुलना (balance sheet) का तरीका बताया।
- तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ ((2018) 9 SCC 501): मॉब लिंचिंग रोकने के लिए राज्यों को निवारक और दंडात्मक निर्देश दिए। धारा 103(2) इसी पृष्ठभूमि से निकली है।
आम भ्रम
हत्या और आपराधिक मानव वध में अंतर
अंतर आशय और ज्ञान की मात्रा का है। मृत्यु की संभावना जितनी अधिक और आशय जितना स्पष्ट, अपराध उतना हत्या की ओर जाता है। यदि मामला धारा 101 के किसी अपवाद में आता है, जैसे गंभीर और अचानक प्रकोपन (grave and sudden provocation), निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का अतिक्रमण या अचानक झगड़ा, तो अपराध हत्या न रहकर धारा 105 के अंतर्गत आपराधिक मानव वध बनता है।
क्या धारा 103 में 10 साल की सज़ा हो सकती है
नहीं। धारा 103(1) में सबसे कम सज़ा आजीवन कारावास है। कम अवधि की सज़ा तभी संभव है जब दोषसिद्धि धारा 105 या किसी अन्य धारा में बदली जाए।
आम लोगों के लिए व्यावहारिक जानकारी
- हत्या संज्ञेय अपराध है, इसलिए परिवार या कोई भी जानकार व्यक्ति सीधे थाने में FIR दर्ज करा सकता है। थाना FIR से इनकार करे तो BNSS के तहत पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत भेजी जा सकती है, और उसके बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन का रास्ता है।
- FIR की निःशुल्क प्रति शिकायतकर्ता का अधिकार है। गवाहों के नाम और CCTV जैसी जानकारी जल्द सुरक्षित रखें।
- अभियुक्त पक्ष के लिए: अपराध अजमानती है, इसलिए नियमित जमानत सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय से मांगी जाती है। अग्रिम जमानत का प्रावधान BNSS धारा 482 में है, पर हत्या जैसे गंभीर मामलों में अदालतें बहुत सावधानी से विचार करती हैं।
परीक्षा की दृष्टि से (Exam angle)
- IPC 302 = BNS 103, IPC 300 = BNS 101, IPC 299 = BNS 100, IPC 304 = BNS 105। ये चारों मिलान CLAT, AIBE और न्यायिक सेवा में बार-बार पूछे जाते हैं।
- मॉब लिंचिंग के लिए न्यूनतम संख्या पाँच व्यक्ति है और सज़ा मृत्युदंड या आजीवन कारावास, साथ में जुर्माना।
- “Genus और species” का वाक्य पुन्नैया केस से है, और “rarest of rare” बचन सिंह से।
- वर्गीकरण याद रखें: संज्ञेय, अजमानती, अशमनीय, सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently asked questions)
धारा 302 नई धारा क्या है?
IPC की धारा 302 अब BNS की धारा 103 है। सामान्य हत्या धारा 103(1) में और मॉब लिंचिंग धारा 103(2) में आती है।
धारा 103 BNS में कितनी सज़ा है?
मृत्युदंड या आजीवन कारावास, और साथ में जुर्माना। आजीवन कारावास से कम सज़ा इस धारा में नहीं दी जा सकती।
क्या धारा 103 में जमानत मिल सकती है?
अपराध अजमानती है, इसलिए जमानत अधिकार नहीं, अदालत का विवेक है। साक्ष्य की प्रकृति, अभियुक्त की भूमिका और हिरासत की अवधि जैसे तथ्यों पर सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय निर्णय करते हैं।
मॉब लिंचिंग की धारा कौन सी है?
BNS की धारा 103(2)। यह तब लागू होती है जब पाँच या अधिक लोग मिलकर जाति, समुदाय, भाषा, जन्मस्थान, व्यक्तिगत विश्वास जैसे आधार पर हत्या करें।
क्या हत्या के केस में समझौता हो सकता है?
नहीं। हत्या BNSS धारा 359 की शमनीय अपराधों की सूची में नहीं है, इसलिए समझौते से केस समाप्त नहीं होता।
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क्विक क्विज़ (Quick quiz)
Q1. IPC की धारा 302 का BNS में समकक्ष क्या है?
- धारा 101
- धारा 103
- धारा 105
- धारा 109
उत्तर देखें
उत्तर: B. हत्या की सज़ा अब BNS धारा 103 में है। धारा 101 परिभाषा देती है।
Q2. धारा 103(2) के अंतर्गत मॉब लिंचिंग के लिए समूह में न्यूनतम कितने व्यक्ति होने चाहिए?
- तीन
- चार
- सात
- पाँच
उत्तर देखें
उत्तर: D. धारा 103(2) पाँच या अधिक व्यक्तियों के समूह पर लागू होती है।
Q3. “Rarest of rare” सिद्धांत किस निर्णय से जुड़ा है?
- बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य
- विरसा सिंह बनाम पंजाब राज्य
- तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ
- के.एम. नानावटी बनाम महाराष्ट्र राज्य
उत्तर देखें
उत्तर: A. बचन सिंह (1980) में संविधान पीठ ने कहा कि मृत्युदंड केवल दुर्लभतम मामलों में दिया जाए।
Q4. BNS धारा 103 का अपराध किस न्यायालय द्वारा विचारणीय है?
- प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
- मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट
- सत्र न्यायालय
- कोई भी मजिस्ट्रेट
उत्तर देखें
उत्तर: C. BNSS की प्रथम अनुसूची के अनुसार हत्या सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
Q5. IPC की धारा 300 (हत्या की परिभाषा) BNS में किस धारा में है?
- धारा 100
- धारा 101
- धारा 102
- धारा 104
उत्तर देखें
उत्तर: B. हत्या की परिभाषा और उसके अपवाद अब BNS धारा 101 में हैं।
स्रोत (Sources)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023, धारा 100, 101 और 103 (India Code)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, प्रथम अनुसूची
- बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य, (1980) 2 SCC 684
- तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ, (2018) 9 SCC 501
- लोकसभा प्रश्नोत्तर, गृह मंत्रालय, BNS धारा 103(2) पर
यह पृष्ठ शिक्षा और सामान्य जानकारी के लिए है, किसी विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं।
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